(राकेश अचल)
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि वो कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहते थे, उनके ख़िलाफ़ साज़िश हुई है.गहलोत का ये कथन बताता है कि वे अभी तक सियासत से अघाए नहीं है. अशोक गहलोत जैसे नेता ही कांग्रेस के असली दुश्मन हैं.
शुरू से कांग्रेस के युवा नेतृत्व के रास्ते में बाधक अशोक गहलोतको सचिन पायलट के नाम से आज भी फुरफुरी होती है. वे दंभ से कहते हैं कि -श्रीमती सोनिया गांधी ने बिना मांगे तीन बार मुझे मुख्यमंत्री का पद दिया. सोनिया गांधी अगर मुझे कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनातीं तो मैं मना करूंगा? मैं अनपढ़ नहीं हूं, मैं कभी मना नहीं करता. मुझे लगता है कि बड़ी साज़िश हुई.
हिन्दुस्तान में लोग समझते हैं कि अशोक गहलोत जो हैं उन्हें मुख्यमंत्री रहना था, कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनना था, इसलिए विद्रोह हुआ.”
गहलोत कहते हैं कि -चाहे कोई मेरा करीबी ही क्यों न हो उसके दिमाग़ में भी यही बात है कि अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री रहना था इसलिए विद्रोह करवा दिया. अब मैं उनको कैसे समझाऊं, मैं आज समझा रहा हूं आपको. अगर अब भी कुछ भला हो जाए तो भला करना मेरा.”
अशोक गहलोत का यह कहना हास्यास्पद लगता है कि आज मेरे पास सब कुछ है, मैं देश का एक बेहद संतुष्ट राजनेता हूं. अब मैं किसी पद के पीछे नहीं भाग रहा हूं.”उन्होंने कहा, “मैं विद्रोह नहीं चाहता था लेकिन उसके बाद भी ऐसी स्थिति बन गई तो मैं माफ़ी चाहता हूं.”
दरअसल अशोक गहलोत को अपने से बडे जादूगर मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से सीखना चाहिए. दिग्विजय सिंह ने 2003 में कांग्रेस की पराजय के बाद एक दशक तक कोई चुनाव न लडने का व्रत लिया और उसे पूरा किया. दिग्विजय ने अपनी ओर से तीसरी बार राज्यसभा का चुनाव न लडने का ऐलान किया और कोई दावा नहीं किया.
समय की मांग तो ये कहती है कि अब कांग्रेस से तमाम बूढे हो चुके नेताओं को चुनावी और पदों की राजनीति से दूर होना चाहिए, अन्यथा उनकी वैसी ही फजीहत होगी जैसी जादूगर अशोक गहलोत की हो रही है.गहलोत ऐसे समय में बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं जबकि राहुल गांधी इस दशक की सबसे बडी राजनीतिक लडाई लड रहे हैँ.
हकीकत ये है कि अशोक गहलोत की जो भी हैसियत है वो कांग्रेस की वजह से है. उनमें यदि साहस हो तो वे एक बार कैप्टेन अमरिंदर सिंह की तरह का छोडकर देख लें. क्योंकि अब ये तो तय हो गया है कि कांग्रेस में उनका युग अब समापन की ओर है.गहलोत तमाम कोशिश के बावजूद अब भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते, हाँ वे कांग्रेस का थोडा-बहुत नुक्सान जरूर कर सकते हैँ.
शुरू से कांग्रेस के युवा नेतृत्व के रास्ते में बाधक अशोक गहलोतको सचिन पायलट के नाम से आज भी फुरफुरी होती है. वे दंभ से कहते हैं कि -श्रीमती सोनिया गांधी ने बिना मांगे तीन बार मुझे मुख्यमंत्री का पद दिया. सोनिया गांधी अगर मुझे कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनातीं तो मैं मना करूंगा? मैं अनपढ़ नहीं हूं, मैं कभी मना नहीं करता. मुझे लगता है कि बड़ी साज़िश हुई.
हिन्दुस्तान में लोग समझते हैं कि अशोक गहलोत जो हैं उन्हें मुख्यमंत्री रहना था, कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनना था, इसलिए विद्रोह हुआ.”
गहलोत कहते हैं कि -चाहे कोई मेरा करीबी ही क्यों न हो उसके दिमाग़ में भी यही बात है कि अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री रहना था इसलिए विद्रोह करवा दिया. अब मैं उनको कैसे समझाऊं, मैं आज समझा रहा हूं आपको. अगर अब भी कुछ भला हो जाए तो भला करना मेरा.”
अशोक गहलोत का यह कहना हास्यास्पद लगता है कि आज मेरे पास सब कुछ है, मैं देश का एक बेहद संतुष्ट राजनेता हूं. अब मैं किसी पद के पीछे नहीं भाग रहा हूं.”उन्होंने कहा, “मैं विद्रोह नहीं चाहता था लेकिन उसके बाद भी ऐसी स्थिति बन गई तो मैं माफ़ी चाहता हूं.”
दरअसल अशोक गहलोत को अपने से बडे जादूगर मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से सीखना चाहिए. दिग्विजय सिंह ने 2003 में कांग्रेस की पराजय के बाद एक दशक तक कोई चुनाव न लडने का व्रत लिया और उसे पूरा किया. दिग्विजय ने अपनी ओर से तीसरी बार राज्यसभा का चुनाव न लडने का ऐलान किया और कोई दावा नहीं किया.
समय की मांग तो ये कहती है कि अब कांग्रेस से तमाम बूढे हो चुके नेताओं को चुनावी और पदों की राजनीति से दूर होना चाहिए, अन्यथा उनकी वैसी ही फजीहत होगी जैसी जादूगर अशोक गहलोत की हो रही है.गहलोत ऐसे समय में बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं जबकि राहुल गांधी इस दशक की सबसे बडी राजनीतिक लडाई लड रहे हैँ.
हकीकत ये है कि अशोक गहलोत की जो भी हैसियत है वो कांग्रेस की वजह से है. उनमें यदि साहस हो तो वे एक बार कैप्टेन अमरिंदर सिंह की तरह का छोडकर देख लें. क्योंकि अब ये तो तय हो गया है कि कांग्रेस में उनका युग अब समापन की ओर है.गहलोत तमाम कोशिश के बावजूद अब भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते, हाँ वे कांग्रेस का थोडा-बहुत नुक्सान जरूर कर सकते हैँ.

