( राकेश अचल )
मैं भारत के उस हिस्से से आता हूँ जिसे चंबल कहते हैं. चंबल के बीहड, चंबल नदी असंख्य भरत तिवारियों के फर्जी एनकाउंटरों की चश्मदीद है. लेकिन चंबल को संतोष है कि उसकी गोद में, उसकी आंखों के सामने भरत तिवारी की तरह किसी निर्दोष को कैमरे के सामने नहीं मारा गया.
भरत तिवारी की हत्या के मामले में लिखने के लिए मुझसे मेरे सैकडों पाठकों ने आग्रह किया. आग्रह करने वालों में कुछ ब्राम्हण थे, कुछ हिंदू थे, कुछ सनातनी थे लेकिन कानून की दिन दहाडे उडाई गई धज्जियों से दृवित कोई नहीं था. मुझे भरत को मारे जाने पर हैरानी इसलिए नहीं हुई क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी पुलिस से कहा था कि पुलिस अपराधी की जाति पूंछकर गोली मारे.
सवाल भरत तिवारी की हत्या का नहीं है. काननून और व्यवस्था का मुद्दा नहीं है. ये मुद्दा है उस रामराज का है जो त्रेता का नहीं अपितु कलियुग का है. इस नृशंस हत्या के लिए बिहार सरकार को, बिहार की पुलिस को, देश के गृहमंत्री को और प्रधानमंत्री को शर्मिंदा होना चाहिए, लेकिन कोई शर्मिंदा नहीं है.क्योंकि इस दशक में देश के नेता शर्मरोधी हैं.
दरअसल देश में भरत तिवारी की दिनदहाडे बर्दी वाले गुंडों द्वारा की गई हत्या को लेकर कोई आक्रोश है ही नहीं. सब नपुंसक शोक जता रहे हैं. देश यदि रामराज में अतीक अहमद जैसे माफियाओं की पुलिस अभिरक्षा में की गई हत्या के समय ही यदि जाग जाता तो मुमकिन है कि भरत तिवारी का नंबर आता ही नहीं.
भरत तिवारी भी सनातनी ज्वर का शिकार था. उसे लगता होगा कि बिहार में रामराज आ गया है. सरकार सनातनियों की है, पुलिस सनातनियों की है, इसलिए भला उसे कोई क्यों मारेगा? . लेकिन भरत भाजपा के रामराज में मारा गया. सनातनी किंतु बर्बर पुलिस के हाथों मारा गया. उसकी हत्या करने वालों को फांसी की सजा देने के लिए किसी शहादत की जरुरत ही नहीं. एक वीडियो ही काफी है. लेकिन इस देश की न्यापालिका भी सनातनी ज्वर से पीडित है. उसे दिन दहाडे की गई भरत तिवारी की हत्या भी बिहार के रामराज के लिए अनिवार्य, अपरिहार्य और विधि सम्मत कार्रवाई लगेगी.
सवाल किया जा रहा है कि”भरत भूषण को पुलिस ने जब ‘मानसिक अस्वस्थ’ बताया था, तब एक दिन बाद ही एनकाउंटर क्यों कर दिया?”
भोजपुर ज़िले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गाँव के 26 साल के युवक भरत भूषण तिवारी की 17 जून को मारा गया. पुलिस और सिस्टम के लिए ये पुलिस एनकाउंटर था जबकि सबने देखा कि न भरत ने पुलिस पर कोई गोली चलाई और न कोई प्रतिरोध किया.पुलिस के मुताबिक भरत की मौत जेरे इलाज हुई थी.
मामले में भरत की मां ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए केस दर्ज करने का आवेदन किया था.. इसी को लेकर जगदीशपुर के तत्कालीन एसडीपीओ राजेश कुमार शर्मा, शाहपुर थानाध्यक्ष राजेश कुमार मालाकार सहित अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है. इस मामले को लेकर भरत के गांव में महापंचायत हो रही है, जिसमें परिजनों के साथ-साथ आसपास गांव के लोग शामिल हो रहे हैं.
राजद सांसद ने कहा है कि भरत की हत्या के लिए एसटीएफ पटना से भेजी गई थी. राजद सांसद सुधाकर सिंह ने एसटीएफ एडीजी कुंदन कृष्णा पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि एनकाउंटर करने के लिए पटना से टीम भेजी गई थी. बड़ा सवाल ही उठता है कि एसटीएफ को भोजपुर भेजा किसने? सांसद ने कहा कि भोजपुर पुलिस ने भरत तिवारी का एनकाउंटर नहीं किया, पटना से जो एसटीएफ की टीम गई थी, उसी ने किया है.
चंबल मे 2006 तक आए दिन फर्जी मुठभेडें होती थीं. पुलिस निर्दोष ग्रामीणों को डाकू बताकर मार देती थी, लेकिन मरने वाले को शरण में आने के बाद भी दौडाकर मारा जाता था. उसके हाथों में लोडेड तमंचा रखा जाता था. भरत ने तो खाली तमंचा पुलिस को सौँपा था फिर भी उसे मार दिया गया.
मुझे लगता है कि भारत की नृशंस, बर्बर, हिंसक, असभ्य, अमानुषिक पुलिस को अमेरिका, इंग्लैंड की पुलिस की तरह बनाने में हमें पूरी एक सदी लगेगी. मेरे तमाम आईपीएस अधिकारी जो डीजीपी बने वे पुलिस को बाबी पुलिस बनाने का सपना देखते हुए रिटायर हो गए. भगवान जाने भारत की पुलिस कितने और भरत तिवारियों की जान लेने के बाद सभ्यता का पहला सबक सीख सकेगी.
भरत की शहादत न भारतीय जनमानस को झकझोर सकी, न सिस्टम को. न न्यायपालिका का रोम फडका और न मानवाधिकार के नाम पर रोटियां सेंकने वाले सामने आए. सबका खून ठंडा पडा है. इस समय में रेत में सिर दबाकर तूफान गुजरने की प्रतीक्षा कर रहे देश को नहीं पता कि-‘कल भरततिवारी की तरह वे भी मारे जाएंगे क्योंकि देश में रामराज आया ही नहीं है. एक मायाजाल है आज का रामराज.
भरत तिवारी की हत्या के मामले में लिखने के लिए मुझसे मेरे सैकडों पाठकों ने आग्रह किया. आग्रह करने वालों में कुछ ब्राम्हण थे, कुछ हिंदू थे, कुछ सनातनी थे लेकिन कानून की दिन दहाडे उडाई गई धज्जियों से दृवित कोई नहीं था. मुझे भरत को मारे जाने पर हैरानी इसलिए नहीं हुई क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी पुलिस से कहा था कि पुलिस अपराधी की जाति पूंछकर गोली मारे.
सवाल भरत तिवारी की हत्या का नहीं है. काननून और व्यवस्था का मुद्दा नहीं है. ये मुद्दा है उस रामराज का है जो त्रेता का नहीं अपितु कलियुग का है. इस नृशंस हत्या के लिए बिहार सरकार को, बिहार की पुलिस को, देश के गृहमंत्री को और प्रधानमंत्री को शर्मिंदा होना चाहिए, लेकिन कोई शर्मिंदा नहीं है.क्योंकि इस दशक में देश के नेता शर्मरोधी हैं.
दरअसल देश में भरत तिवारी की दिनदहाडे बर्दी वाले गुंडों द्वारा की गई हत्या को लेकर कोई आक्रोश है ही नहीं. सब नपुंसक शोक जता रहे हैं. देश यदि रामराज में अतीक अहमद जैसे माफियाओं की पुलिस अभिरक्षा में की गई हत्या के समय ही यदि जाग जाता तो मुमकिन है कि भरत तिवारी का नंबर आता ही नहीं.
भरत तिवारी भी सनातनी ज्वर का शिकार था. उसे लगता होगा कि बिहार में रामराज आ गया है. सरकार सनातनियों की है, पुलिस सनातनियों की है, इसलिए भला उसे कोई क्यों मारेगा? . लेकिन भरत भाजपा के रामराज में मारा गया. सनातनी किंतु बर्बर पुलिस के हाथों मारा गया. उसकी हत्या करने वालों को फांसी की सजा देने के लिए किसी शहादत की जरुरत ही नहीं. एक वीडियो ही काफी है. लेकिन इस देश की न्यापालिका भी सनातनी ज्वर से पीडित है. उसे दिन दहाडे की गई भरत तिवारी की हत्या भी बिहार के रामराज के लिए अनिवार्य, अपरिहार्य और विधि सम्मत कार्रवाई लगेगी.
सवाल किया जा रहा है कि”भरत भूषण को पुलिस ने जब ‘मानसिक अस्वस्थ’ बताया था, तब एक दिन बाद ही एनकाउंटर क्यों कर दिया?”
भोजपुर ज़िले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गाँव के 26 साल के युवक भरत भूषण तिवारी की 17 जून को मारा गया. पुलिस और सिस्टम के लिए ये पुलिस एनकाउंटर था जबकि सबने देखा कि न भरत ने पुलिस पर कोई गोली चलाई और न कोई प्रतिरोध किया.पुलिस के मुताबिक भरत की मौत जेरे इलाज हुई थी.
मामले में भरत की मां ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए केस दर्ज करने का आवेदन किया था.. इसी को लेकर जगदीशपुर के तत्कालीन एसडीपीओ राजेश कुमार शर्मा, शाहपुर थानाध्यक्ष राजेश कुमार मालाकार सहित अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है. इस मामले को लेकर भरत के गांव में महापंचायत हो रही है, जिसमें परिजनों के साथ-साथ आसपास गांव के लोग शामिल हो रहे हैं.
राजद सांसद ने कहा है कि भरत की हत्या के लिए एसटीएफ पटना से भेजी गई थी. राजद सांसद सुधाकर सिंह ने एसटीएफ एडीजी कुंदन कृष्णा पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि एनकाउंटर करने के लिए पटना से टीम भेजी गई थी. बड़ा सवाल ही उठता है कि एसटीएफ को भोजपुर भेजा किसने? सांसद ने कहा कि भोजपुर पुलिस ने भरत तिवारी का एनकाउंटर नहीं किया, पटना से जो एसटीएफ की टीम गई थी, उसी ने किया है.
चंबल मे 2006 तक आए दिन फर्जी मुठभेडें होती थीं. पुलिस निर्दोष ग्रामीणों को डाकू बताकर मार देती थी, लेकिन मरने वाले को शरण में आने के बाद भी दौडाकर मारा जाता था. उसके हाथों में लोडेड तमंचा रखा जाता था. भरत ने तो खाली तमंचा पुलिस को सौँपा था फिर भी उसे मार दिया गया.
मुझे लगता है कि भारत की नृशंस, बर्बर, हिंसक, असभ्य, अमानुषिक पुलिस को अमेरिका, इंग्लैंड की पुलिस की तरह बनाने में हमें पूरी एक सदी लगेगी. मेरे तमाम आईपीएस अधिकारी जो डीजीपी बने वे पुलिस को बाबी पुलिस बनाने का सपना देखते हुए रिटायर हो गए. भगवान जाने भारत की पुलिस कितने और भरत तिवारियों की जान लेने के बाद सभ्यता का पहला सबक सीख सकेगी.
भरत की शहादत न भारतीय जनमानस को झकझोर सकी, न सिस्टम को. न न्यायपालिका का रोम फडका और न मानवाधिकार के नाम पर रोटियां सेंकने वाले सामने आए. सबका खून ठंडा पडा है. इस समय में रेत में सिर दबाकर तूफान गुजरने की प्रतीक्षा कर रहे देश को नहीं पता कि-‘कल भरततिवारी की तरह वे भी मारे जाएंगे क्योंकि देश में रामराज आया ही नहीं है. एक मायाजाल है आज का रामराज.

