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अब तेरा क्या होगा अडानी?

 (@ राकेश अचल)
ये शीर्षक मशहूर फिल्म ‘शोले’ के संवाद -‘ तेरा क्या होगा कालिया ‘? से प्रेरित है. यह चर्चा एक ऐसे उद्योगपति की है जिनका नाम पिछले तीन वर्षों से भारतीय राजनीति, शेयर बाजार और अंतरराष्ट्रीय अदालतों में बराबर गूंज रहा है. और ये नाम है गौतम अडानी.
सोशल मीडिया पर लोग फिल्म शोले का मशहूर संवाद दोहरा रहे हैं— “अब तेरा क्या होगा अडानी?”लेकिन क्या सचमुच अडानी मुश्किल में हैं, या मामला उतना सीधा नहीं है? आइए पूरी कहानी समझते हैं.
 बात जनवरी 2023 की है.  अमेरिकी शॉर्ट-सेलिंग फर्म हिडन बर्ग रिसर्च ने एक रिपोर्ट जारी की थी.रिपोर्ट में आरोप लगाए गए कि अडानी समूह ने शेयर कीमतों में हेरफेर, अपारदर्शी विदेशी कंपनियों के इस्तेमाल और कॉरपोरेट गवर्नेंस में गंभीर खामियां बरतीं है.अडानी समूह ने इन आरोपों को पूरी तरह झूठा और दुर्भावनापूर्ण बताया.लेकिन असर बहुत बड़ा हुआ.कुछ ही दिनों में अडानी समूह के शेयरों का बाजार मूल्य लगभग 150 अरब डॉलर तक घट गया.
 इस रिपोर्ट की वजह से भारत की राजनीति में भी भूचाल आ गया था.कांग्रेस और विपक्ष ने इसे सरकार और अडानी के रिश्तों से जोड़कर बड़ा मुद्दा बनाया था.हिन्डनबर्ग रिपोर्ट के बाद अमेरिकी एजेंसियों ने अडानी समूह के कुछ अंतरराष्ट्रीय लेन-देन और निवेश जुटाने के तरीकों की जांच तेज की.मार्च 2024 में खबर आई कि अमेरिकी न्याय विभाग और  एस ई सी कथित रिश्वतखोरी तथा निवेशकों को दी गई सूचनाओं की जांच कर रहे हैं.
 बात 20 नवंबर 2024 की है.अमेरिका के न्यूयॉर्क की संघीय अदालत में अडानी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ अभियोग दायर हुआ.अभियोजन पक्ष का दावा था कि भारत में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के ठेके हासिल करने के लिए लगभग 25 करोड़ डॉलर (250 मिलियन डॉलर) की कथित रिश्वत योजना बनाई गई.
अडानी समूह पर अमेरिकी निवेशकों से धन जुटाते समय भ्रष्टाचार संबंधी जानकारियां छिपाने और भ्रामक जानकारी देने के आरोप भी लगाए गए.ध्यान रखिए! ये आरोप थे. अदालत ने किसी को दोषी घोषित नहीं किया था.इस मामले के बादसंसद में हंगामा हुआ.कांग्रेस ने जेपीसी की मांग दोहराई.राहुल गांधी ने बार-बार अडानी मुद्दा उठाया।
भाजपा ने कहा कि कानून अपना काम करेगा.इसके बाद
शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला.
अडानी समूह ने कहा—हम हर आरोप का अदालत में जवाब देंगे.
अब आते हैं सबसे दिलचस्प हिस्से पर.2026 में, राष्ट्रपति डोनाल्ड  ट्रंप के प्रशासन के दौरान अमेरिकी न्याय विभाग ने अदालत को बताया कि वह इस मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहत.ऐसा माना गया कि ये प्रस्ताव अडानी समूह द्वारा अमेरिका मे व्यापक निवेश करने की पेशकश के बाद किया गया.
18 मई 2026 को न्याय विभाग ने अदालत से मामला खारिज करने का अनुरोध किया। बचाव पक्ष ने भी अदालत से औपचारिक रूप से केस समाप्त करने की मांग की.
अमेरिका के इस फैसले ने पूरी दुनिया को चौंका दिया.सवाल उठने लगे कि क्या सरकार बदलने से मुकदमे की दिशा भी बदल गई?
 लेकिन अदालत ने ब्रेक लगा दिया.अब कहानी में नया मोड़ आया.26 जून 2026 को अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस ग्रोफिस ने कहा—सरकार केवल दो पन्नों का आवेदन देकर इतना बड़ा मामला बंद नहीं कर सकती.उन्होंने न्या़य विभाग से कहा कि-‘ 13 जुलाई तक विस्तार से बताइए कि मामला वापस क्यों लिया जा रहा है.
यानीमामला अभी खत्म नहीं हुआ है.आरोप अभी रिकॉर्ड पर बने हुए हैं, जब तक अदालत अंतिम आदेश न दे.इसका मतलब क्या है?इस फैसले का अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि—
अडानी दोषी सिद्ध हो गए.या अदालत ने  न्याय विभाग को हमेशा के लिए रोक दिया.बल्कि अदालत कह रही हैकि-
“कारण बताइए? कानून का पालन कीजिए. उसके बाद फैसला होगा.’
 निश्चित ही अदालत के नये रुख का असर भारत पर  पडेगा.
अब देखिए इसके राजनीतिक परिणाम क्या होते हैं? मुमकिन है कि विपक्ष कहेगा कि देखिए, अमेरिका की अदालत भी मामला बंद करने को तैयार नहीं.सरकार समर्थक कहेंगे’ कि
जब खुद अमेरिकी सरकार मुकदमा नहीं चलाना चाहती तो विपक्ष का प्रचार गलत साबित है.यानी राजनीतिक बहस अभी और तेज होगी।
 इस समय मैं अमेरिका में ही हूँ. यहाँ के लोग अदालत के इस रुख से बिल्कुल हैरान नहीं हैं. आमतौर पर यहाँ कहा जा रहा है कि ये भारतीय न्यायालय नहीं है. यहाँ सरकार के फैसलों के खिलाफ फैसले आना आम बात है, क्योंकि अमेरिका में ँःयायिक सेवा से जुडे लोगों की कोई राजनीतिक महात्वाकांक्षा शायद नहीं होती.
भारत के निवेशक अब 13 जुलाई और उसके बाद अदालत के अंतिम आदेश का इंतजार करेंगे.यदि अदालत न्याय विभाग की दलीलों से संतुष्ट हो जाती है तो मामला समाप्त हो सकता है.
यदि अदालत और सवाल पूछती है, तो कानूनी अनिश्चितता कुछ समय और बनी रह सकती है.
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