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ग्वालियर| शहर के हर वार्ड में आम जनता को घर के पास ही मुफ्त और बेहतर इलाज मुहैया कराने के संकल्प के साथ शुरू किए गए मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिक’ आज खुद बीमार नजर आ रहे हैं। स्टाफ और डॉक्टरों की भारी कमी के चलते स्वास्थ्य विभाग का यह ड्रीम प्रोजेक्ट दम तोड़ रहा है। नतीजा यह है कि जिन मरीजों को छोटी-मोटी बीमारियों के लिए घर के पास इलाज मिलना चाहिए था, वे आज जयारोग्य , जिला और सिविल अस्पतालों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार इस बदहाली से वाकिफ तो हैं, लेकिन व्यवस्था सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे।
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शहर के कुल 48 संजीवनी क्लीनिकों में से 8 में स्थाई डॉक्टर ही मौजूद नहीं हैं। विभाग यहां एक-दो दिन छोडकऱ वैकल्पिक डॉक्टरों की ड्यूटी लगाकर महज खानापूर्ति कर रहा है। यानी जिस दिन साहब आए तो अस्पताल खुला, वरना ताला लटका रहता है। इस अव्यवस्था का सीधा असर अंचल के बड़े अस्पतालों पर पड़ रहा है, जहां ओपीडी में मरीजों की बेतहाशा भीड़ बढ़ गई है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, शहर की पीएचई कॉलोनी, तृप्ति नगर (नदी पार टाल), सागर ताल, झाडू वाला मोहल्ला, 50 क्वाटर हजीरा, डीडी नगर, रायरू और कांच मिल क्षेत्र के संजीवनी क्लीनिकों में डॉक्टरों का टोटा है। इन केंद्रों से डॉक्टर या तो नौकरी छोडकऱ जा चुके हैं या इस्तीफा दे चुके हैं। विभाग का दावा है कि ऑन कॉल डॉक्टर भेजे जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ये क्लीनिक सिर्फ शो-पीस बनकर रह गए हैं।
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