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ग्वालियर। चंबल नदी से रेत उत्खनन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक और मुरैना-भिंड से ग्वालियर में रेत की आवाजाही पर प्रतिबंध के बावजूद अवैध रेत कारोबार थमता नजर नहीं आ रहा है। प्रशासन ने सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाते हुए चार प्रमुख मार्गों पर पुलिस बल तैनात कर रखा है, लेकिन रेत माफिया ने भी अपने तौर-तरीके बदल लिए हैं। नतीजा यह है कि शहर से सटी कॉलोनियां अब अवैध रेत के नए डंपिंग स्टेशन बनती जा रही हैं।
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जानकारी के अनुसार, भिंड और मुरैना की सीमाओं से जुड़े रास्तों पर पुलिस ने तंबू लगाकर चौबीसों घंटे निगरानी शुरू की है। रेत की अवैध ढुलाई रोकने के लिए तीन शिफ्टों में कुल 52 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और डंपरों की सघन जांच भी की जा रही है, लेकिन इसके बावजूद रेत तस्करी के मामले सामने आ रहे हैं। रेत कारोबार की गतिविधियों पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि पुलिस की निगाह मुख्य रूप से ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और डंपरों पर रहती है। इसका फायदा उठाकर रेत माफिया अब बड़े ट्रकों, विशेषकर एलपी ट्रकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें रेत भरने के बाद ऊपर से त्रिपाल कसकर बांध दिया जाता है, जिससे बाहर से देखने पर सामान्य मालवाहक वाहन प्रतीत होते हैं। ऐसे में कई बार जांच चौकियों पर तैनात पुलिसकर्मी भी ट्रकों में लदी रेत का अंदाजा नहीं लगा पाते और वाहन आसानी से निकल जाते हैं।
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शहर की सीमा से लगे कई आवासीय क्षेत्रों में इन दिनों रात के अंधेरे में रेत की खेप पहुंचाई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले रेत से भरे वाहन सीधे शहर के विभिन्न निर्माण स्थलों तक पहुंचते थे, लेकिन अब सख्ती बढ़ने के बाद माफियाओं ने रणनीति बदल दी है। वे आबादी वाले इलाकों और सुनसान प्लॉटों में रेत का भंडारण कर रहे हैं, जहां से जरूरत के अनुसार छोटे वाहनों के जरिए इसकी आपूर्ति की जा रही है।रहवासियों का आरोप है कि देर रात भारी वाहनों की आवाजाही से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। सुबह होते ही खाली प्लॉटों और कॉलोनियों के किनारों पर रेत के बड़े-बड़े ढेर दिखाई देते हैं, जिससे स्पष्ट है कि रातभर डंपिंग का काम जारी रहता है। रेत की उपलब्धता घटने और प्रशासनिक सख्ती के कारण बाजार में इसके दाम बढ़ने लगे हैं। ऐसे में पहले से रेत का भंडारण करने वाले कारोबारियों और जमाखोरों को आर्थिक लाभ मिल रहा है। निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों का कहना है कि रेत की कमी का असर मकान निर्माण और अन्य परियोजनाओं पर पड़ रहा है।
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सीमाओं पर पुलिस बल की तैनाती और चौबीस घंटे निगरानी के बावजूद कॉलोनियों तक रेत पहुंचना कई सवाल खड़े करता है। यदि अवैध परिवहन पर प्रभावी रोक लगी है, तो फिर आबादी वाले क्षेत्रों में रेत के ढेर कैसे पहुंच रहे हैं? यह स्थिति बताती है कि रेत माफिया लगातार अपने तौर-तरीके बदल रहे हैं, जबकि निगरानी तंत्र को भी उतनी ही तेजी से अपनी रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है। प्रशासनिक सख्ती के बीच अवैध रेत कारोबार का यह नया तरीका चिंता का विषय बन गया है।
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