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दतिया| दतिया में पूर्व गृहमंत्री औऱ कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से बवाल मचा हुआ है। 6 बार विधायक और पूर्व गृहमंत्री नरोतत्म मिश्रा का टिकट कटने से समर्थकों में भारी गुस्सा है औऱ वो प्रदर्शन कर रहे हैं। नरोतत्म के समर्थको ने केवल सड़के जाम कर दी बल्कि बाजार भी बंद कर दिए और जमकर हंगामा किया।
दतिया विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए 6 बार के विधायक और शिवराज चौहान के समय में सीएम के बाद नंबर 2 समझे वाले पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर एक तरह से सबको चौंका दिया है। संगठन से जुड़े आशुतोष तिवारी को दतिया से उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने नया दांव खेला है। अगर गौर किया जाए तो 36 साल के चुनावी सफर में यह पहली बार हुआ कि डॉ. मिश्रा टिकट की दौड़ से बाहर हुए । साथ ही इस फैसले ने एक नई राजनीतिक चर्चा भी छेड़ दी है। वैसे नरोत्तम मिश्रा ने तो उपचुनाव की तैयारी के लिए जनसंपर्क अभियान भी शुरु कर दिया था, विभिन्न समाज के लोगों के साथ बैठकें भी थीं औऱ यहां तक की नामांकन पत्र भी खरीद लिया था।
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3 बार डबरा और 3 बार दतिया से जीते है नरोत्तम
नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक सफर साल 1990 में शुरु हुआ था जब वो डबरा विधानसभा सीट से पहली बार जीते थे।लेकिन परिसीमन के बाद डबरा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई तो उन्होंने 2008 में दतिया का रुख किया और लगातार 3 बार विधायक बने। लेकिन साल 2023 के विधानसभा चुनाव उनके लिए निराशा लेकर आय़ा, जब राजेंद्र भारती ने धूल चटा दी। बाद में राजेंद्र भारती की एक केस में सदस्यता समाप्त हो गई और दतिया में उपचुनाव की नौबत आई। इसी बीच नरोत्तम को उम्मीद थी कि उन्हें टिकट मिल जाएगा लेकिन पार्टी ने कुछ औऱ ही सोच रखा था। लिहाजा करीब साढ़े 3 दशकों के इतिहास में ये पहली बार हुआ जब नरोत्तम का टिकट कटा हो।
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नरोत्तम मिश्रा ने पार्टी का फैसला माना, अब इस्तीफा देने वाले BJP कार्यकर्ताओं का क्या होगा?
मीडिया से बातचीत में नरोत्तम मिश्रा ने दो टूक कहा कि यह पार्टी का निर्णय है। मैंने कल भी यही कहा था और आज भी यही कह रहा हूं। पार्टी के मंच पर अपनी बात कही जाती है, इस तरह नहीं। उनके इस बयान को संगठन के प्रति अनुशासन और प्रतिबद्धता के संदेश के रूप में देखा जा रहा है। डॉ. मिश्रा के रुख के बाद अब सबसे बड़ा सवाल उन भाजपा कार्यकर्ताओं को लेकर खड़ा हो गया है जिन्होंने विरोध स्वरूप अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था। जब नेता स्वयं संगठन के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है, तब क्या समर्थक भी अपने कदम पीछे खींचेंगे? क्या वे पार्टी में वापसी का रास्ता चुनेंगे या संगठन उनके इस्तीफों को स्वीकार कर नई नियुक्तियों की दिशा में आगे बढ़ेगा?
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