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ग्वालियर। मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना के तहत अंचल के बच्चों को निजी स्कूलों की तर्ज पर आधुनिक और उच्च स्तरीय शिक्षा देने के लिए सांदीपनि स्कूल तो खोल दिए गए, लेकिन जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की लापरवाही के कारण योजना का मूल उद्देश्य ही भटक गया है। जिले में संचालित हो रहे आठ सांदीपनि स्कूलों में से सात स्कूलों के छात्र-छात्राएं पिछले चार साल से स्कूल बस सेवा शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं।
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डबरा के सांदीपनि स्कूल को छोड़ दिया जाए तो जिले के अन्य किसी भी स्कूल में अब तक परिवहन सुविधा बहाल नहीं हो सकी है। नतीजतन हजारों विद्यार्थियों को हर दिन ऑटो, वैन या अपने निजी वाहनों से भारी खर्च उठाकर स्कूल पहुंचना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा फजीहत शहर के किला गेट स्थित सांदीपनि कन्या विद्यालय की छात्राओं को उठानी पड़ रही है। किला गेट पर संचालित होने वाले सांदीपनि कन्या विद्यालय को प्रशासन द्वारा हाल ही में ट्रिपल आइटीएम के पास नए भवन में शिफ्ट कर दिया गया है। नया भवन शहर के मुख्य हिस्से से काफी दूर और आउटर में होने के कारण छात्राओं को आवागमन में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अभिभावकों का कहना है कि जब स्कूल किला गेट पर था, तब बच्चियां पैदल या आटो से आसानी से पहुंच जाती थीं, लेकिन शिफ्ट होने के बाद न तो वहां के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट उपलब्ध है और न ही विभाग की ओर से बसें चलाई जा रही हैं। ऐसे में पालकों को रोजाना अपनी बेटियों को छोड़ने और लेने जाना पड़ता है, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहे हैं। कई मध्यमवर्गीय परिवार आटो व ई रिक्शा का भारी-भरकम किराया देने को मजबूर हैं।
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किलागेट पर संचालित होने वाले सांदीपनि कन्या विद्यालय का नया भवन पुराने भवन से करीब छह से सात किमी दूर है। इस स्कूल में किला गेट के आसपास के और भी सरकारी स्कूलों के मिलाया गया है। चूंकि यह स्कूल केवल छात्राओं के लिए है और नया भवन काफी दूर व शहर से अलग है। ऐसे में कक्षा एक से लेकर 12वीं तक की छात्राओं को आने जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। इसी तरह कुलैथ गांव के सांदीपनी स्कूल में भी आसपास के तीन से चार किमी के दायरे के सरकारी स्कूलों को एकीकृत कर दिया गया है। ग्रामीण क्षेत्र का स्कूल होने से छात्रों को सात से आठ किमी दूर स्कूल में आना पड़ता है। सांदीपनि स्कूल कक्षा एक से 12वीं तक हैं। सबसे अधिक परेशानी प्रायमरी सेक्सन के बच्चों को होती है। अभिभावकों को अपने साधनों से बच्चों को इन स्कूलों में छोड़ने आना पड़ता है और बाद में लेने के लिए भी आना पड़ता है।
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