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भोपाल | मध्यप्रदेश में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। जल्द ही मोहन कैबिनेट में नए चेहरों को जगह मिलने की संभावना है। लेकिन इस बार विस्तार केवल नए चेहरों को मौका देने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि सरकार के सामने क्षेत्रीय असंतोष को दूर करने की भी बड़ी चुनौती है। कई ऐसे जिले और संभाग हैं जो सरकार गठन के करीब ढाई साल बाद भी खुद को सत्ता की मुख्यधारा से दूर महसूस कर रहे हैं।
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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर सवालों के घेरे में हैं। खासतौर पर नर्मदापुरम संभाग से मंत्रिमंडल में एक भी मंत्री नहीं होने के कारण वहां के राजनीतिक और सामाजिक वर्गों में उपेक्षा की भावना देखी जा रही है। यही वजह है कि संभावित मंत्रिमंडल विस्तार से सबसे अधिक उम्मीदें उन क्षेत्रों को हैं जिन्हें अब तक पर्याप्त भागीदारी नहीं मिली है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में अब करीब ढाई वर्ष का समय बचा है। सिंहस्थ की तैयारियों और आगामी चुनावी गतिविधियों को देखते हुए सरकार के पास सीमित राजनीतिक समय है। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार को केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को साधने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है।
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नौ जिलों वाले जबलपुर संभाग को मंत्रिमंडल में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिला है। वहीं छह जिलों वाले रीवा संभाग को भी केवल सीमित भागीदारी प्राप्त हुई है। रीवा संभाग से उपमुख्यमंत्री सहित तीन मंत्री हैं, लेकिन इनमें दो राज्यमंत्री स्तर के हैं। राजनीतिक हलकों में इसे भी क्षेत्रीय असंतुलन के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में नर्मदापुरम, जबलपुर और रीवा संभाग जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता मिल सकती है। इसके साथ ही आदिवासी, ओबीसी, महिला और क्षेत्रीय संतुलन के समीकरणों को भी ध्यान में रखा जाएगा। सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि नए चेहरों को अवसर देते हुए मौजूदा शक्ति संतुलन भी बरकरार रखा जाए।
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दूसरी ओर, पांच जिलों वाले भोपाल संभाग को मंत्रिमंडल में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। भोपाल, सीहोर, रायसेन और राजगढ़ जिलों से कुल छह मंत्री मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं। खास बात यह है कि अकेले राजगढ़ जिले से ही दो राज्यमंत्री शामिल हैं। इसी कारण क्षेत्रीय संतुलन को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि किसी क्षेत्र को लंबे समय तक सत्ता में भागीदारी नहीं मिलती, तो वहां कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। नर्मदापुरम संभाग को इसका प्रमुख उदाहरण माना जा रहा है, जहां तीन जिलों के बावजूद मंत्रिमंडल में एक भी प्रतिनिधि नहीं है। ऐसे में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को केवल पदों के वितरण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी और भाजपा की व्यापक राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार क्षेत्रीय संतुलन साधने के लिए किन नए चेहरों पर भरोसा जताती है।
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