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ग्वालियर । इस बार सूर्यदेव के तीखे तेवरों ने न केवल आम जनता का गला सुखाया, बल्कि सरकारी अस्पतालों के दवा काउंटरों को भी खाली कर दिया। स्वास्थ्य विभाग के मई महीने के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले और एक बड़ा विरोधाभास दिखाने वाले हैं। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि मई की झुलसाने वाली गर्मी में अस्पतालों में ओपीडी मरीजों की कुल संख्या (फुटफॉल) जनवरी की तुलना में करीब 11 हजार कम रही, लेकिन दवाओं की खपत कम होने के बजाय 33 फीसदी तक बढ़ गई। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों ने ही दवाओं की खपत पर सवाल खड़े कर दिए हैं?
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डॉक्टरों के मुताबिक जनवरी की कडकड़़ाती ठंड में अस्पतालों में 2,16,638 मरीज इलाज कराने पहुंचे थे, तब मौसमी बीमारियों (खांसी, जुकाम, बुखार) के कारण दवाएं सीमित मात्रा में लगीं। इसके उलट मई में जब पारा 45 डिग्री के पार जाने लगा, तब कुल 2,05,548 मरीज ही अस्पताल पहुंचे। मरीज कम हुए, लेकिन धूप और लू के थपेड़ों के कारण अस्पताल आने वाला हर दूसरा शख्स डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और उल्टी-दस्त से बेहाल था। यही वजह रही कि मरीजों की संख्या घटने के बावजूद दवाओं और ड्रिप्स की रिकॉर्ड तोड़ खपत दर्ज की गई। मई के महीने में आसमान से बरसती आग के बीच सरकारी अस्पतालों में सलाइन (ड्रिप की बोतलें) मरीजों के लिए जीवनदायिनी साबित हुईं। शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) को दूर करने के लिए डॉक्टरों को धड़ाधड़ बोतलें चढ़ानी पड़ीं। आंकड़ों को देखें तो नॉर्मल सलाइन (नमक पानी) की बोतलें जनवरी में जहां महज 400 लगी थीं, वहीं मई में यह 13 गुना से ज्यादा उछलकर 5,220 पर पहुंच गईं। इसी तरह एनर्जी देने वाली ग्लूकोज युक्त बोतल की मांग तो जनवरी में सिर्फ 49 थी, जो मई में आसमान छूती हुई 1,648 तक पहुंच गई।
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