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ग्वालियर। शहर में तेजी से बढ़ता ई-वेस्ट अब गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट का रूप लेता जा रहा है। घरों, दफ्तरों, दुकानों और संस्थानों से रोजाना निकलने वाला इलेक्ट्रॉनिक कचरा खुलेआम कबाड़ी बाजार में पहुंच रहा है, जबकि इसके वैज्ञानिक निपटान के लिए जिम्मेदार सिस्टम केवल कागजों तक सीमित नजर आता है। अनुमान है कि शहर से हर साल करीब 500 से 600 टन ई-वेस्ट निकलता है, लेकिन इसके संग्रहण, रिसाइक्लिंग और सुरक्षित निस्तारण की कोई प्रभावी व्यवस्था अभी तक धरातल पर नहीं दिख रही। ई-वेस्ट में पुराने मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप, टीवी, फ्रिज, वायरिंग सामग्री, बैटरी, चार्जर और अन्य खराब इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल हैं। इनका गलत तरीके से निपटान शहर के लिए बड़ा खतरा बन रहा है।
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मुरैना रोड स्थित ग्राम सिसेरा (दिलावर का पुरा) में ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर स्थापित किया गया था, लेकिन यहां लंबे समय से रिसाइक्लिंग और प्रबंधन का काम बंद पड़ा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश शहरवासियों को इस सेंटर की जानकारी तक नहीं है। ऐसे में लोग मजबूरी में खराब इलेक्ट्रॉनिक सामान कबाड़ियों को बेच देते हैं। कबाड़ी ई-वेस्ट खरीदकर अपने स्तर पर उसे तोड़ते हैं। प्लास्टिक, तार और धातु अलग करने के बाद बाकी अनुपयोगी हिस्सा खुले में फेंक दिया जाता है या जला दिया जाता है। इस प्रक्रिया से निकलने वाले मर्करी, लेड, कैडमियम, निकेल और आर्सेनिक जैसे जहरीले तत्व मिट्टी, हवा और पानी में घुल जाते हैं। इससे पर्यावरण प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। देश में लागू ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2022 के तहत शहरों में कलेक्शन सेंटर, रिसाइक्लिंग यूनिट और वैज्ञानिक डिस्पोजल व्यवस्था अनिवार्य की गई है। इसके बावजूद ग्वालियर में इन नियमों का असर नजर नहीं आता। न तो व्यवस्थित संग्रहण नेटवर्क है और न ही लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। केदारपुर लैंडफिल साइट से रोजाना कबाड़ चोरी होने की शिकायतें सामने आती हैं। जिम्मेदार अधिकारियों की अनदेखी के कारण यहां पहुंचने वाला इलेक्ट्रॉनिक कचरा भी अवैध बाजार में पहुंच रहा है, जिससे समस्या और गंभीर हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार ई-वेस्ट के संपर्क में आने से सांस संबंधी बीमारी, त्वचा रोग, आंखों में जलन, तंत्रिका तंत्र पर असर और गंभीर रोगों का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर ज्यादा खतरनाक माना जाता है।
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