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ग्वालियर। मध्यप्रदेश भाजपा के भीतर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का आंतरिक विरोध और उनके समर्थकों को एडजस्ट करने की चुनौती लगातार बनी हुई है। वर्ष 2020 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद से ही ग्वालियर-चंबल संभाग सहित पूरे प्रदेश में मूल भाजपा बनाम सिंधिया गुट की यह खींचतान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय रही है।
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इस विरोध के बढ़ने और समर्थकों के पिछड़ने के पीछे कई समीकरण काम कर रहे हैं। भाजपा के भीतर प्रदेश कार्यसमिति और जिला स्तर पर होने वाली संगठनात्मक नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों की सूचियों को लेकर अक्सर पेंच फंसता रहा है। मूल भाजपा कैडर अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को तरजीह देना चाहता है, जिससे सिंधिया खेमे के जमीनी नेताओं को मनमुताबिक जगह नहीं मिल पा रही है। हाल ही में मई 2026 में सोशल मीडिया पर पार्टी विरोधी पोस्ट करने के कारण सिंधिया समर्थक कृष्णा घाडगे को जिला भाजपा संगठन द्वारा नोटिस जारी किया गया, जो आंतरिक असंतोष को खुलकर सामने लाता है। गुना-शिवपुरी क्षेत्र में पूर्व सांसद केपी यादव और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों के बीच वर्चस्व की जंग अक्सर देखने को मिलती है। मई 2026 में दोनों गुटों के बीच चले पोस्टर वॉर के बाद भाजपा संगठन को कड़ा रुख अपनाते हुए अनुशासन का हंटर चलाना पड़ा था। मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार द्वारा केपी यादव को नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया जाना यह दर्शाता है कि संगठन सिंधिया के धुर विरोधियों को भी बराबर मजबूत रख रहा है, जिससे सिंधिया समर्थकों का दबदबा सीमित हुआ है। 2023 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सिंधिया गुट के कई नेताओं को टिकट दिया था, लेकिन उनमें से महज 55 फीसदी ही जीत दर्ज कर सके। कई बड़े मंत्रियों की हार ने संगठन में सिंधिया खेमे की सौदेबाजी की ताकत को कमजोर कर दिया।
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शिवपुरी जैसे सिंधिया के प्रभाव वाले गढ़ों में भी मूल भाजपा पार्षदों और नेताओं द्वारा अपनी ही नगर पालिका अध्यक्ष के खिलाफ खुली बगावत और सामूहिक इस्तीफे सौंपने जैसे मामले सामने आए हैं। भाजपा में पद और प्रतिष्ठा न मिलने से नाराज होकर सिंधिया के साथ भाजपा में आए कई जमीनी नेता और पूर्व विधायक समय-समय पर भाजपा छोड़कर वापस कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। कार्यकर्ताओं में यह भावना घर कर रही है कि भाजपा के अनुशासित और काडर-बेस्ड ढांचे में उन्हें वह प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है जो कांग्रेस में मिलती थी। यहां बता दें कि भाजपा केंद्रीय नेतृत्व यद्यपि ज्योतिरादित्य सिंधिया को केंद्र में बड़ी भूमिका (दूरसंचार मंत्रालय) देकर पूरा सम्मान दे रहा है, लेकिन प्रादेशिक और स्थानीय स्तर पर उनके समर्थकों को पूरी तरह से एड्जस्ट करना भाजपा के लिए आज भी एक बड़ी अग्निपरीक्षा बना हुआ है।
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