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(धीरज बंसल)
ग्वालियर। व्यापार जगत के सबसे प्रतिष्ठित संगठन मध्यप्रदेश चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के चुनाव को लेकर व्हाइट हाउस से डॉ. प्रवीण अग्रवाल का टिकट कटने के बाद वे खुद चुनाव लड़ेंगे या नहीं, इसे लेकर सस्पेंस बहुत गहरा गया है। व्हाइट हाउस खेमे द्वारा वर्तमान अध्यक्ष डॉ. प्रवीण अग्रवाल के स्थान पर प्रमुख व्यवसायी पारस जैन को अपना आधिकारिक प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद व्यापारिक गलियारों में भारी उलटफेर देखा जा रहा है।
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टिकट कटने के बाद डॉ. प्रवीण अग्रवाल के चुनावी मैदान में उतरने को लेकर उनके निर्दलीय या तीसरे मोर्चे से चुनाव लड़ने की संभावना बनी हुई है। चेंबर की राजनीति में डॉ. प्रवीण अग्रवाल का अपना एक मजबूत व्यक्तिगत प्रभाव और बड़ा समर्थक वर्ग है। उनके समर्थक लगातार उन पर दबाव बना रहे हैं कि वे पीछे न हटें। ऐसी स्थिति में वे निर्दलीय तौर पर या किसी अन्य व्यापारिक धड़े के सहयोग से मैदान में उतर सकते हैं। चेंबर चुनाव में अमूमन दो बड़े धड़ों (व्हाइट हाउस और उनके विरोधी खेमे क्रियेटिव) के बीच सीधा मुकाबला होता है। व्हाइट हाउस से टिकट कटने के बाद यदि प्रवीण अग्रवाल बगावत करते हैं, तो वे विरोधी खेमे के साथ हाथ मिलाकर खुद या अपने किसी करीबी को मैदान में उतारकर संगठन के आधिकारिक पैनल को कड़ी चुनौती दे सकते हैं। एक संभावना यह भी है कि वे चेंबर के वरिष्ठ नेताओं और व्यापारिक एकजुटता का सम्मान करते हुए खुद चुनावी मैदान से दूर रहें और पारस जैन की उम्मीदवारी का समर्थन कर दें। हालांकि, उनके सक्रिय स्वभाव को देखते हुए समर्थकों के बीच इसकी संभावना कम ही मानी जा रही है। डॉ. प्रवीण अग्रवाल ने अभी तक इस घटनाक्रम पर अपने पत्ते पूरी तरह से नहीं खोले हैं। वे अपने कोर ग्रुप और करीबियों के साथ लगातार गुप्त बैठकें कर रहे हैं। प्रवीण अग्रवाल के इस सस्पेंस के कारण विपक्षी खेमा भी अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप नहीं दे पा रहा हैं, क्योंकि चेंबर की राजनीति में उनका एक मजबूत प्रभाव माना जाता है। उनके अगले कदम और आधिकारिक बयान के बाद ही साफ होगा कि वे चुनावी मैदान में डटे रहेंगे या इस बार पर्दे के पीछे से किंगमेकर की भूमिका निभाएंगे।
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- डॉ. प्रवीण अग्रवाल वर्ष 2000 में पहली बार कार्यकारिणी सदस्य के रूप में मध्यप्रदेश चैंबर ऑफ कॉमर्स से जुड़े थे।
- वे लंबे समय तक संस्था में विभिन्न पदों पर रहने के बाद इसके अध्यक्ष बने।
- अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने बिजली निजीकरण के विरोध और स्वर्ण आभूषण कारोबारियों के हितों से जुड़े कई महत्वपूर्ण आंदोलनों का नेतृत्व किया है।
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