ग्वालियर। हाईवे पर दौड़ती वीडियो कोच और स्लीपर बसें यात्रियों को आरामदायक सफर का दावा तो करती हैं, लेकिन सुरक्षा के मामले में कई बसें गंभीर खामियों से घिरी हुई हैं। देशभर में लगातार सामने आ रही बसों में आग लगने की घटनाओं ने परिवहन व्यवस्था और सुरक्षा मानकों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल के महीनों में ग्वालियर में भी चलती बसों में आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें बड़ी जनहानि तो टल गई, लेकिन हादसों ने यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
परिवहन विशेषज्ञों के अनुसार वीडियो कोच बसों में एलईडी टीवी, साउंड सिस्टम, मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट, अतिरिक्त लाइटिंग और एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं बढ़ने से इलेक्ट्रिकल सिस्टम पर अत्याधिक दबाव पड़ता है। यदि वायरिंग मानक गुणवत्ता की न हो या समय-समय पर उसकी जांच नहीं की जाए तो शॉर्ट सर्किट की आशंका बढ़ जाती है। यही कारण अधिकांश आगजनी की घटनाओं में सामने आता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि कई बसों में इंजन के पास डीजल पाइपलाइन या इंजन ऑयल का रिसाव भी पाया जाता है। लंबे रूट पर लगातार चलने से इंजन का तापमान काफी बढ़ जाता है और हल्की स्पार्किंग भी बड़ी आग का रूप ले सकती है। कई निजी ऑपरेटर फिटनेस और तकनीकी जांच को केवल औपचारिकता मानते हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है।
सुरक्षा इंतजाम सिर्फ कागजों में
जांच में सामने आया कि कई बसों में अग्निशामक यंत्र तो लगे हुए थे, लेकिन उनका आकार बेहद छोटा था। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे छोटे यंत्र शुरुआती आग पर तो काबू पा सकते हैं, लेकिन बड़ी आग की स्थिति में प्रभावी नहीं होते। कई बसों में अग्निशामक यंत्र चालक की सीट के पास या ऐसे स्थान पर रखे मिले, जहां आपात स्थिति में यात्रियों का पहुंचना मुश्किल हो सकता है। कुछ बसों में फायर अलार्म सिस्टम और इमरजेंसी सुरक्षा उपकरण भी पर्याप्त नहीं है। यात्रियों का कहना है कि बस ऑपरेटर सुविधाओं का प्रचार तो बड़े स्तर पर करते हैं, लेकिन सुरक्षा इंतजामों पर गंभीरता से ध्यान नहीं देते।
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