
ग्वालियर। शहर में बिल्डर अब लोगों की गाढ़ी कमाई को मुसीबत में डाल रहे हैं। नौबत यह है कि बड़े प्रतिष्ठित संस्थानों के नामों को लैंडमार्क के रूप में उपयोग किया जाता है जिससे खरीदार फंस जाए। हकीकत यह निकलती है कि ऐसे बड़े व महत्वपूर्ण संस्थानों के आसपास नियम-कायदों की बंदिशें काफी रहती हैं और यह बाद में सामने आता है। इसका उदाहरण है कि सिटी सेंटर की डीआरडीई लैब, जहां दो सौ मीटर के दायरे में आने वाले निर्माणों को तोड़े जाने के आदेश हाई कोर्ट में दिए थे, बाद में उच्च स्तर पर प्रयास किए गए तब जाकर निर्माण बच सके। अब डीआरडीई की जो नई लैब बन रही है, उसके आसपास भी दो सौ मीटर का दायरा तय है। बिल्डर्स व कालोनाइजर नई लैब के आसपास अवैध कालोनियां व टाउनशिप बसा रहे हैं और इसका लैंडमार्क भी उपयोग कर रहे हैं।
महाराजपुरा क्षेत्र में बिना पडताल किए और नियमों को समझे लोग कालोनाइजरों के झांसे में फंस रहे हैं। बता दें कि शहर के महाराजपुरा क्षेत्र में अवैध कालोनियों के बसने का सिलसिला जारी है। भिंड रोड से लेकर एयरपोर्ट रोड व एमिटी यूनिवर्सिटी-डीआरडीई लैब के आसपास धड़ल्ले से बिना अनुमतियों के कालोनियां काटी जा रही हैं। अवैध कालोनियों को लेकर नगर निगम ने सूची भी बनाई थी और कार्रवाई भी की थी। मूलभूत सुविधाओं के नाम पर पहले झांसा दिया जाता है और फिर रेरा से लेकर नगर निगम, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग सहित सभी जगह से एनओसी होने का झूठ बोला जाता है। डीआरडीई के 200 मीटर के दायरे में आने वाली संपत्तियों को तोड़ने के लिए हाई कोर्ट ने आदेश दिए थे जिसमें निजी संपत्तियों सहित राज्य व केंद्र की संपत्तियां भी आ रही थीं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें तुड़ाई के आदेश दिए गए थे। रोक लगाने से सिटी सेंटर व आसपास के क्षेत्र की नौ हजार करोड़ की संपत्ति टूटने से बच गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र शासन, याचिकाकर्ता, डीआरडीई के डायरेक्टर, नगर निगम व कलेक्टर से जवाब तलब भी किया गया था।
राजेश भदौरिया ने 2015 में डीआरडीई के 200 मीटर के दायरे में अवैध निर्माण के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने इस जनहित याचिका का निराकरण 28 मार्च 2019 को किया था और नगर निगम व प्रशासन को आदेश दिया था कि 2005 के बाद 200 मीटर के दायरे में जितने भी अवैध व वैध शासकीय और निजी भवन हैं उन्हें तोड़ा जाए। इस आदेश के बाद 142 निर्माणों पर टूटने का खतरा मंडराने लगा। शासन व निगम ने पुर्नविचार याचिका भी लगाई जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी लगाई और सुप्रीम कोर्ट ने स्टे दिया। इसके बाद डीआरडीई को महाराजपुरा में शासन ने जमीन दी।
महाराजपुरा व भिंड रोड के आसपास के पूरे बेल्ट में बिल्डर-कालोनाइजर अनाप-शनाप कीमतों पर प्लाट बेचने में लगे हैं। यहां तीन हजार से चार हजार रुपये तक जमीन की कीमत बताई जाती है लेकिन हकीकत में एक हजार से 1200 रुपये तक में यहां प्लाट खरीदा जा सकता है। कालोनाइजर मात्र शब्द का उपयोग कर तीन से चार हजार रुपए रेट अपने विज्ञापन में खोलते हैं, इससे लोग भ्रमित होते हैं। कलेक्टर गाइडलाइन की गलत जानकारी लोगों को दी जा सकती है, इसलिए यहां प्लाट आदि लेने से पहले लोग पंजीयन विभाग व राजस्व से पूरी जानकारी लेकर ही प्लाट खरीदें।

