
मप्र में भी वर्षों से जजिया कर देशभर के उन व्यापारियों के वाहनों पर लगाया जा रहा है, जो मप्र की सरजमीं से होकर अपनी मंजिल को जाते हैं। औरंगजेब की भूमिका में प्रदेश का परिवहन माफिया है, जो प्रदेश में प्रवेश करने वाले हर द्वार पर लठैत लेकर बैठा है। यह सबकुछ हो रहा है प्रदेश के परिवहन विभाग की नाक के नीचे। व्यापारियों के मालवाहक वाहनों की लंबी लाइन देखकर समझ जाइए खेला चालू आहे। डिजिटल इंडिया के तमाम दावों और वादों के बीच चौकी पर तैनात आरटीओ विभाग की प्राइवेट गैंग जिस ढंग से कारण-अकारण बेखौफ वसूली करती है, उससे समझ आ जाता है कि इस दिशा में कितना कुछ किया जाना शेष है।
सरकार में कुछ अच्छे लोगों द्वारा यदि समय-समय पर समाधान के प्रयास किए भी जाते हैं तो माफिया और उनके इकोसिस्टम में शामिल अफसर, राजनेता से लेकर विभिन्न स्तंभों के चुनिंदा लोग उपरोक्त उम्दा प्रयास पर न सिर्फ हावी हो जाते हैं बल्कि उसे विफल करवा कर ही दम लेते हैं। जाहिर है मामला मलाई का है। ऐसा ही एक प्रयास कुछ समय पहले हुआ था। मैन्युअल चौकियों की जगह गुजरात की तर्ज पर टोल बूथ की तरह इलेक्ट्रानिक जांच चौकियां बनाने की फाइलें मप्र में भी दौड़ीं, लेकिन जब माफिया को भनक लगी तो फाइलों को सतपुड़ा भवन के गुमनाम कक्षों में ऐसा गायब किया कि ढूंढे भी न मिलें। उसने एक झटके में पूरे परिवहन माफिया की रीढ़ तोड़ दी थी। गुजरात के बाद वहां के माफिया ने मप्र के सिस्टम में अपनी जड़ें गहरी कर दीं जिससे वहां की अवैध कमाई के घाटे को मप्र बार्डर पर एंट्री से पाटा जाए। इसका असर यह हुआ कि आज प्रदेश की आरटीओ जांच चौकियां पूरे देश में सर्वाधिक अवैध वसूली के लिए कुख्यात हो चुकी हैं। हाल ही में आंध्रप्रदेश से दिल्ली जा रहे नेल्लोर निवासी ए. रमेश ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर चेकपोस्ट पर हो रही अवैध वसूली को चंबल के डाकुओं से जोड़ दिया। उन्होंने लिखा कि मप्र से गुजरने पर छह गुना अधिक एंट्री देनी पड़ी। मप्र के किस चेक पोस्ट पर उनसे कितने की वसूली हुई, उसका लेखा-जोखा भी लिखा। ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़े लोग आए दिन हड़ताल करते हैं या पत्राचार करते रहते हैं, लेकिन मजाल कि व्यवस्था में रत्तीभर फर्क हुआ हो।
ट्रांसपोर्ट व्यवसाय और आरटीओ से जुड़े लोगों का कहना है कि हर साल मप्र से गुजरने वाले वाहनों से करीब हजार करोड़ रुपये तक की अवैध वसूली हो जाती है। आरटीओ में काम कर रहे या कर चुके अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर एक के बाद एक ऐसी बातों का जिक्र करते हैं जिस पर सहज ही विश्वास नहीं किया जाता। एक-एक बैरियर पर पोस्टिंग के लिए सिर्फ सिफारिश काम नहीं करती, बल्कि बैरियर पोस्टिंग की एक च्अर्थव्यवस्थाज् काम करती है। ट्रकों से जांच के नाम पर जो वसूली की जाती है, वह भी प्राइवेट व्यक्ति होते हैं जिन्हें कटर कहा जाता है। अब तो चेक पोस्ट पर माफिया ने ठेकेदारी प्रथा शुरू कर दी है। इसमेंपूरा सिस्टम निजी होता है। इस प्रक्रिया में नाम और हस्ताक्षर आरटीआइ (रीजनल ट्रांसपोर्ट इंस्पेक्टर ) के उपयोग किए जाते हैं। बदले में एक निश्चित मात्रा में टेक्स-हिस्सेदारी देकर बाकी की वसूली माफिया की जेब में जाती है। ग्वालियर के ट्रांसपोर्ट मुख्यालय में प्रदेश एवं देश के विभिन्न राज्यों से व्यापारी शिकायती पत्र भेजते हैं। ट्रांसपोर्ट आयुक्त सहित अधिकांश अधिकारी भोपाल कैंप आफिस में डेरा और संवाद जमाए रहते हैं, लिहाजा शिकायती पत्रों को नत्थी कर दिया जाता है।

