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लड़ाई केवल शिवराज बनाम शिवराज ही

मध्यप्रदेश के मतदाताओं का फैसला अब ईवीएम मशीनों में बंद हो गया है। इन चुनावों का परिणाम जो भी हो, पूरे प्रचार में सतह पर कुछ भी दिखाई दिया हो, कांग्रेस भले इस बार मजबूती से मैदान पकड़ती नजर आई हो, दोनों ओर के सितारा प्रचारकों ने जमीन-आसमान एक कर दिया हो पर सतह के नीचे ये लड़ाई केवल शिवराज बनाम शिवराज की ही थी। इस लड़ाई में या तो शिवराज जीतेंगे या शिवराज  हारेंगे। ना तो कांग्रेस भाजपा से लड़ी है और ना ही भाजपा के तमाम क्षत्रप एक हो गए पार्टी के लिए| सब अपने विधायक अपनी, जमीन…

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मध्यप्रदेश के मतदाताओं का फैसला अब ईवीएम मशीनों में बंद हो गया है। इन चुनावों का परिणाम जो भी हो, पूरे प्रचार में सतह पर कुछ भी दिखाई दिया हो, कांग्रेस भले इस बार मजबूती से मैदान पकड़ती नजर आई हो, दोनों ओर के सितारा प्रचारकों ने जमीन-आसमान एक कर दिया हो पर सतह के नीचे ये लड़ाई केवल शिवराज बनाम शिवराज की ही थी। इस लड़ाई में या तो शिवराज जीतेंगे या शिवराज  हारेंगे। ना तो कांग्रेस भाजपा से लड़ी है और ना ही भाजपा के तमाम क्षत्रप एक हो गए पार्टी के लिए| सब अपने विधायक अपनी, जमीन बचाने में लगे रहे।
कांग्रेस के खाते में ये उपलब्धि जरूर है कि वो दिखाने के लिए ही सही दिग्विजय, कमलनाथ और सिंधिया के तीव्र अंतरविरोध की धाराओं को साथ रख पाई। ये धैर्य संभावित जीत में हिस्सेदारी और अपना खेल जमाए रखने तक ही सीमित है। मध्यप्रदेश के 2018 के विधानसभा चुनावों की एक बड़ी खासियत ये भी है कि 2014 के अन्य विधानसभा चुनावों की तरह यहां सीधा मोदी बनाम राहुल नहीं हो पाया। भाजपा के प्रवक्ता सफाई देते रहे कि ऐसा पांच राज्यों में चुनाव होने और मोदी की व्यस्तता के चलते हुआ, लेकिन सच यही है कि मोदी को जब भी सीधी लड़ाई लड़नी हो, वो लड़ते हैं। अमित शाह जरूर अपनी रणनीति और दमखम के साथ मध्यप्रदेश के मैदान में डटे हुए दिखाई दिए। पर उन्हें भी शुरुआती दौर में संगठन की पूरी ताकत झोंक देने के बाद समझ में आ गया कि यहां अब शिवराज के बिना नहीं चल पाएगा। 
अपने पिछले 13 साल के कार्यकाल में शिवराज जिस तरीके से वन मैन शो चलाते रहे उसे अब चुनाव के 20-25 दिनों में एकदम उलट देना संभव नहीं है| किसी विधायक के यहाँ खुशी या गम हो तो शिवराज, किसान आंदोलन हो तो शिवराज, कलेक्टर-कमिशनर बदलने हों तो शिवराज, लाड़ली-लक्ष्मी हो तो शिवराज, तीर्थ-दर्शन हो तो शिवराज, भावंतर हो तो शिवराज…..मध्यप्रदेश के टोले-मजरे से लेकर श्यामला हिल्स की पहाड़ियों तक हर जगह शिवराज ने अपनी छाप को इतना मजबूत और दूसरे पहचान चिन्हों को इतना धूमिल कर दिया था कि वल्लभ भवन में लगा हर आइना भी शिवराज की ही शक्ल दिखाने लगा था।यही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सबसे बड़ी ताकत भी रही और कमजोरी भी। कांग्रेस ने अगर ऐन चुनाव के वक्त इन कमजोरियों में सेंध लगाने कि कोशिश भी की तो कौन सा तीर मार लिया? इतना ही मजबूत मौका कांग्रेस के पास 2013 में भी था। तब व्यापम और डम्पर भी चरम पर थे। अगर संगठन अपने पैरों पर खड़ा होता और कांग्रेस ये तय कर पाती कि तीनों नेताओं की लड़ाई में किसे बागडोर सौंपनी है तो आज कांग्रेस शिवराज की कमजोरी की बजाय अपने दम पर जीत के सपने देख रही होती। सत्ता विरोध की तमाम लहर के बीच भी आज शिवराज के पास संघ और संगठन की ताकत भी मौजूद है। भीतरी कलह भुला कर वो चुनाव में तो हाथ बंटा ही देते हैं, वहीं कांग्रेस के सेवादल, युवा कांग्रेस, भाराछासं और महिला कांग्रेस जो कभी पार्टी की रीढ़ तैयार करते थे उनमें वो संगठनात्मक ऊर्जा और परिवर्तन की चाह क्यों नजर नहीं आती? 
भाजपा के सबसे बड़े रणनीतिकार अमित शाह ने भी शुरू में संगठन को आगे रखने की बात कही और फिर शिवराज को ही आगे हो जाने दिया। बदलाव की आहट को भांपते हुए संघ ने भी आखिरी क्षणों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उधर कांग्रेस ने बदलाव की बयार को तेज करने में हर स्तर पर अपनी ताकत लगा दी। इस पूरे चुनाव में जुबानी तीर भी खूब चले। मां–पिता से लेकर गोत्र तक की चर्चा हुई। ये तो खैर 11 तारीख को ही पता चलेगा की आज ईवीएम में क्या दर्ज हुआ है और शिवराज एक अकेले योध्दा साबित हुए हैं या फिर 13 साल बाद खुद अकेले पड़ गए हैं।
मध्यप्रदेश के मतदाताओं का फैसला अब ईवीएम मशीनों में बंद हो गया है। इन चुनावों का परिणाम जो भी हो, पूरे प्रचार में सतह पर कुछ भी दिखाई दिया हो, कांग्रेस भले इस बार मजबूती से मैदान पकड़ती नजर आई हो, दोनों ओर के सितारा प्रचारकों ने जमीन-आसमान एक कर दिया हो पर सतह के नीचे ये लड़ाई केवल शिवराज बनाम शिवराज की ही थी। इस लड़ाई में या तो शिवराज जीतेंगे या शिवराज  हारेंगे। ना तो कांग्रेस भाजपा से लड़ी है और ना ही भाजपा के तमाम क्षत्रप एक हो गए पार्टी के लिए| सब अपने विधायक अपनी, जमीन…

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