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बूँद-बूँद पानी को तरसने की बारी

(राकेश अचल) सियासत और विरासत को छोड़िये ,ये तो बाद में भी सम्हल जायेंगीं ,अभी प्रकृति के तेवरों को देखिये और प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना छोड़िये अन्यथा न राम बचाने आएंगे और न अल्लाह ! सब झुलस जाएगा ,बूँद-बूँद पानी को तरस जाएगी मनुष्य प्रजाति ,फिर चाहे वो हिन्दू हो या न हो .क्योंकि धरती के नीचे का पानी लगातार समाप्त हो रहा है और धरती की सतह तवे की तरह तपने लगी है . कांग्रेस के चिंतन शिविर और ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे जैसे मुद्दों के बीच ये खबर कहीं दबकर रह गयी कि चेन्नई में भूमिगत जल…

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(राकेश अचल)
सियासत और विरासत को छोड़िये ,ये तो बाद में भी सम्हल जायेंगीं ,अभी प्रकृति के तेवरों को देखिये और प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना छोड़िये अन्यथा न राम बचाने आएंगे और न अल्लाह ! सब झुलस जाएगा ,बूँद-बूँद पानी को तरस जाएगी मनुष्य प्रजाति ,फिर चाहे वो हिन्दू हो या न हो .क्योंकि धरती के नीचे का पानी लगातार समाप्त हो रहा है और धरती की सतह तवे की तरह तपने लगी है .
कांग्रेस के चिंतन शिविर और ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे जैसे मुद्दों के बीच ये खबर कहीं दबकर रह गयी कि चेन्नई में भूमिगत जल पूरी तरह समाप्त हो गया है और देश की राजधानी दिल्ली का पारा 49 डिग्री सेल्शियस तक जा पहुंचा है .ये सब किसी राजनीतिक दल की वजह से नहीं बल्कि हमारी जीवनशैली और कुप्रबंधन की वजह से हुआ है .अब खतरा ये है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को मंदिर,मस्जिद और मजहब तो सौंप सकते हैं लेकिन पीने का पानी नहीं .जब पानी नहीं होगा ,तब इन सब चीजों का हम क्या करेंगे ये सोचकर दिल बैठने लगता है ,आँखों के आगे अन्धेरा छाने लगता है .
चैन्नई के इर्दगिर्द समुद्र है लेकिन जमीन के नीचे 2 हजार फीट तक पानी का नामो निशान नहीं है. हमने शहर को इस तरह से विकसित किया है कि जमीन का पोर-पोर सीमेंट और कंक्रीट ने खा लिया है. जमीन के भीतर वर्षा का जल जाता ही नहीं है ,फलस्वरूप पानी का प्राकृतिक भण्डार धीरे-धीरे समाप्त हो गया और हमें कानों-कान खबर तक नहीं हुई .पानी विहीन चैन्नई को आप उठाकर किसी दूसरी जगह नहीं ले जा सकते ,अब वहां पानी दूसरी जिंसों की तरह खरीदकर पीना पडेगा .
प्रकृति के साथ खिलवाड़ का चैन्नई एक नमूना भर है,जबकि हालात पूरे देश और दुनिया में लगातार बिगड़ रहे हैं,खासतौर पर भारत में .भारत में भूमिजल की स्थिति सोचनीय है .देश में भूजल विकास की स्थिति 58 प्रतिशत है और विभिन्न क्षेत्रों में भूजल का विकास समान नहीं है। देश के चयनित क्षेत्रों में भूजल के तीव्र विकास के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ है जिसके परिणामस्वरूप भूजल के स्तर में कमी एवं तटीय क्षेत्रों में समुद्र जल का अवांछित प्रवेश हुआ है। 5723 प्रशासनिक इकाइयों ब्लाॅक/तालुक/मण्डल/जलविभाजकों) में 839 इकाइयाँ अत्यधिक शोषित, 226 इकाइयाँ क्रान्तिक, 550 इकाइयाँ अर्द्धक्रान्तिक, 4078 इकाइयाँ सुरक्षित एवं 30 इकाइयाँ लवणीय हैं।आपको बता दें कि भूजल का 2 प्रतिशत हिस्सा उद्योगों में उपयोग किया जाता है। शहरों में जल की 50 प्रतिशत और गांवों में जल की 85 प्रतिशत घरेलू आवश्यकता भूजल से पूरी होती है।
मुझे याद है कि आज से कोई पचपन साल पहले हमारे स्कूल के कुए में भूजल चार हाथ की गहराई पर मिल जाता था ,लेकिन आज उसी स्कूल में भूजल पाने के लिए 700 फीट गहरी खुदाई करना पड़ रही है. चैन्नई में पहले 200 फीट की खुदाई करने पर भूजल उपलब्ध था किन्तु आज 2000 फीट नीचे जाने के बाद भी पानी की बूँद नहीं मिल रही है .कमोवेश यही स्थिति पूरे देश की है .देश में सतही जल की मात्रा भी लगातार कम हो रही है. हमारी नदियाँ सूख रही हैं,तालाब मर रहे हैं ,लेकिन इसकी फ़िक्र किसी को नहीं है .सब मुगलों और अंग्रेजों के जमाने का भारत बदलने में लगे हैं .
दिल्ली में गर्मी के कहर ने पिछले सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए हैं। रविवार को दिल्ली में तापमान 49 डिग्री के पार पहुंच गया। गर्म और शुष्क पछुआ हवा से प्रभावित दिल्ली में लू का प्रकोप चरम पर पहुंच गया। गर्मी के सितम ने लोगों का जीना बेहाल कर दिया है।अकेले दिल्ली ही नहीं देश का एक बड़ा हिस्सा इसी तरह की परेशानी झेल रहा है .दुर्भाग्य ये है कि हम सूरज के तेवरों को कम करने के उपाय खोजने के बजाय ज्यादा से ज्यादा एयर कंडीशनर बनाने और इस्तेमाल करने की होड़ में शामिल हैं .हम प्रकृति से समझौता नहीं करना चाहते ,जूझना चाहते हैं .हम धरती पर हरियाली का प्रतिशत नहीं बढ़ाना चाहते,हम आसमान से बरसने वाला पानी धरती को वापस नहीं लौटाना चाहते .लेकिन ऐसा कब तक चलेगा ?एक दिन पराजय हमारी ही होगी .
जिस देश में ‘ डग-डग रोटी,पग-पग नीर ‘ उपलब्ध था उसी देश में अब रोटी और पानी डग-डग क्या मीलों-मील दुर्लभ हो गया है. पीने के पानी की तमाम योजनाएं,घोषणाएं प्यास नहीं बुझा पा रहीं हैं. 150 मिलीलीटर पानी पांच रूपये में बिक रहा है. जो प्रकृति का उपहार था वो अब बाजार का माल बन चुका है .इंदौर जैसे शहर में पानी की किल्ल्त इतनी है कि प्रति परिवार पीने और निस्तार के पानी के लिए कम से कम एक हजार रूपये महीना अलग से देना पड़ रहे हैं .आधे से अधिक शहर को पानी टेंकरों के जरिए मुहैया कराया जा रहा है . लेकिन शहरों को स्मार्ट बनाने की धुन में डूबी सरकारों को इस घोषित और अघोषित संकट की फ़िक्र ही नहीं है .सब कुछ भगवान के भरोसे चल रहा है .
भीषण जल संकट के चलते भारत में पानी का कारोबार तेजी से पनप रहा है .क्या आप सोच सकते हैं कि कभी निशुल्क मिलने वाला पानी अब बाकायदा बिकता है .पीने का पानी साल दर साल एक कारोबार में बदल गया और 50 साल के अंदर 1.80 लाख करोड़ रुपये का बिजनेस बन गया. वहीं ट्रेड प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक 2023 तक ये इंडस्ट्री 4.5 लाख करोड़ तक का कारोबार कर सकती है.ये आंकड़े आपको इसलिए नहीं चौंकाते क्योंकि आप आज पानी खरीदने की स्थिति में है किन्तु जब यही पानी पेट्रोल और डीजल की तरह पानी के पम्पों से मिलने लगेगा तब आपको नानी याद आएगी .और बहुत ज्यादा दिन नहीं है जब गांव-गांव ,शहर-शहर में सरकार पानी के पम्पों का आवंटन करे और एक नए कारोबार को सृजित करने का श्रेय लूटने की कोशिश करे .
आज जरूरत इस बात की है कि हमारी सत्ता और सियासत की प्राथमिकताएं बदली जाएँ.उन्हें मंदिर,मस्जिद,मजहब से बाहर निकालकर रोजी,रोटी और पानी कि तरफ वापस लाया जाये ,अन्यथा जो स्थितियां बनने वाली हैं उनमें न राम काम आएंगे और न अल्लाह .सब इधर-उधर जान बचते फिरेंगे .जो लोग आज बात-बात पर सड़कों पर जुलूस और प्रदर्शन करने के लिए सहज उपलब्ध हैं वे ही है पानी,है पानी करते न दिखाई दें तो कहियेगा .

(राकेश अचल) सियासत और विरासत को छोड़िये ,ये तो बाद में भी सम्हल जायेंगीं ,अभी प्रकृति के तेवरों को देखिये और प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना छोड़िये अन्यथा न राम बचाने आएंगे और न अल्लाह ! सब झुलस जाएगा ,बूँद-बूँद पानी को तरस जाएगी मनुष्य प्रजाति ,फिर चाहे वो हिन्दू हो या न हो .क्योंकि धरती के नीचे का पानी लगातार समाप्त हो रहा है और धरती की सतह तवे की तरह तपने लगी है . कांग्रेस के चिंतन शिविर और ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे जैसे मुद्दों के बीच ये खबर कहीं दबकर रह गयी कि चेन्नई में भूमिगत जल…

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