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युवराज पर लट्टू ग्वालियर वाले

ग्वालियर बिना राजा, महाराजा के नहीं रह सकता ऐसा मुझे 26 साल के महाआर्यमन सिंधिया के जन्मदिन पर रानीमहल में हुए जलसे को देखकर लगा .रानीमहल में महाआर्यमन का अभिनंदन करने उमड़ी भीड़ हालांकि पूरे ग्वालियर का प्रतिनिधित्व नहीं करती किन्तु इस भीड़ में वे तमाम लोग शामिल थे जो किसी दल के प्रति नहीं बल्कि महल के प्रति आस्थावान हैं .महाआर्यमन केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के इकलौते पुत्र हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो भाजपा में शामिल होने के बाद अपने आपको महाराज कहलवाना बंद कर दिया है लेकिन उनके बेटे युवराज के रूप में ही प्रतिष्ठित किये जा रहे…

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ग्वालियर बिना राजा, महाराजा के नहीं रह सकता ऐसा मुझे 26 साल के महाआर्यमन सिंधिया के जन्मदिन पर रानीमहल में हुए जलसे को देखकर लगा .रानीमहल में महाआर्यमन का अभिनंदन करने उमड़ी भीड़ हालांकि पूरे ग्वालियर का प्रतिनिधित्व नहीं करती किन्तु इस भीड़ में वे तमाम लोग शामिल थे जो किसी दल के प्रति नहीं बल्कि महल के प्रति आस्थावान हैं .महाआर्यमन केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के इकलौते पुत्र हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो भाजपा में शामिल होने के बाद अपने आपको महाराज कहलवाना बंद कर दिया है लेकिन उनके बेटे युवराज के रूप में ही प्रतिष्ठित किये जा रहे हैं .
देश की आजादी के बाद राजनीति में सक्रिय ग्वालियर की पूर्व सिंधिया रियासत की चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि महाआर्यमन सिंधिया सौ फीसदी राजनीति के लिए तैयार किये जा रहे हैं. सिंधिया परिवार में अब तक राजनीति के अलावा कोई और धंधा चुना ही नहीं है. सिंधिया परिवार की अंतिम राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया ने राजनीति में कदम 38 साल की उम्र में रखा था.वे लगातार 44 साल राजनीति में सक्रिय रहीं .वे अपने बेटे के साथ भी लोकसभा में एक साथ बैठीं हलनिक दोनों के राजनितिक मंच अलग-अलग रहे .उन्होंने सिंधिया रियासत की महारानी के रूप में 1941 में ग्वालियर में प्रवेश किया था और आजादी के एक दशक बाद वे सक्रिय राजनीति में आयीं थीं
राजमाता विजयाराजे सिंधिया के रहते उनके बेटे माधवराव सिंधिया को ठीक इसी तरह मात्र 13 साल की उम्र से युवराज की तरह जनता के बीच प्रतिष्ठित किया गया था .माधवराव सिंधिया ने भी मात्र 26 वर्ष की उम्र में गुना से लोकसभा का पहला चुनाव लड़ा था .56 वर्ष की वय में उनकी एक विमान हादसे में मृत्यु हुई थी .वे पूरे 30 साल राजनीति में सक्रिय रहे. माधवराव सिंधिया राजनीति में अजेय रहे और उनकी छवि मिस्टर क्लीन की थी .
माधवराव सिंधिया के राजनीतिक उत्तराधिकारी बने ज्योतिरादित्य सिंधिया भी किशोरावस्था से अपने पिता के चुनावों में सक्रिय रूप से हिस्सेदारी करते थे ..उनकी प्राणप्रतिष्ठा भी ठीक एक युवराज की तरह की गयी थी लेकिन उनका क्रेज उनके बेटे जैसा नजर नहीं आया .ज्योतिरादित्य अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु के बाद 30 साल की उम्र में राजनीति में आये और पिछले 20 साल से लगातार राजनीति में सक्रिय हैं. ज्योतिरादित्य को महेंद्र सिंह कालूखेड़ा जैसे गंभीर नेता ने राजनीति में ककहरा सिखाया था ,लेकिन ज्योतिरादित्य के बेटे महाआर्यमन को सीखने वालों की फेहरिश्त बहुत लम्बी है.
राजनीति में अपनी आँखों के सामने अपने बेटे को प्रतिष्ठित होते देखने वाले कम ही भाग्यशाली लोग होते हैं.ज्योतिरादित्य सिंधिया के कहते में ये सौभाग्य आता दिखाई दे रहा है. समझा जा रहा है की यदि ज्योतिरादित्य की चली तो वे इस बार खुद तो ग्वालियर से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे और अपने बेटे के लिए गुना से टिकिट मांगेंगे .गुना सिंधिया परिवार की अजेय सीट थी किन्तु पिछले लोकसभा चुनाव में इस सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार गए थे .वे इस कलंक को अपने बेटे को चुनाव लादकर मिटाना चाहते हैं .यदि ऐसा सम्भव हुआ तो गुना से लोकसभा का चुनाव लड़ने वाली सिंधिया परिवार की चौथी पीढ़ी होगी .
ज्योर्तिरादित्य सिंधिया के बेटे ने अमेरिका के येल विश्व विद्यालय से प्रबंधन में मास्टर उपाधि हासिल की है ,लेकिन वे अपनी इस उपाधि का इस्तेमाल अंतत:राजनीति के लिए ही करने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहे हैं .अपने 26 वे जन्मदिन पर तलवार से केक काटने वाले महाआर्यमन की राजनीतिक पालकी उठाने के लिए महल के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की एक फ़ौज मौजूद है. पहले इसमें सिर्फ कांग्रेसी शामिल थे लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपा के तमाम कार्यकर्ता भी इस फ़ौज में शामिल हो गए हैं .
पिछले चार दशक में मैंने भी पहली बार महल परिसर में वो दृश्य देखे जो मुंबई में अमिताभ बच्चन और शाहरुख के जन्मदिन पर इन दोनों की एक झलक पाने के लिए नजर आते थे .महाआर्यमन के जन्मदिन पर बाकायदा महल की और से एक आयोजन कर जनता को उसमें खुला आमंत्रण भेजा गया. प्रदेश के अनेक मंत्रियों ने इस मौके पर अखबारों में विज्ञापन देकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई .विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चित्र भी लगाया गया .राजनीति में सिंधिया परिवार की मौजूदगी से कांग्रेस कभी महल के बाहर नहीं निकल पायी थी लेकिन भाजपा के साथ ऐसा नहीं हुआ था.राजमाता विजयाराजे सिंधिया और बाद में उनकी बेटी यशोधरा राजे,भाई ध्यानेन्द्र सिंह ,भाभी माया सिंह के रहते हुए भी महल की भाजपा नहीं बन पायी लेकिन अब ऐसा हो जाये तो कहा नहीं जा सकता .हालाँकि इसकी संभावनाएं कम हैं .क्योंकि भाजपा में अभी भी संगठन प्रधान माना जाता है .ग्वालियर के उद्यमियों की संस्था मप्र चैंबर आफ कामर्स से लेकर तमाम संगठन महाआर्यमन का अभिनंदन करने की होड़ में शामिल हैं ,क्योंकि सभी को वे भविष्य के नेता लगने लगे हैं .
गौरतलब है कि सिंधिया मोदी सरकार के सबसे अमीर मंत्रियों में से एक हैं. इसीलिए इस परिवार को जनसेवा के लिए अपने आपको समर्पित करने में कभी कोई हिचक नहीं हुई .राजनीति इनके लिए धंधा नहीं है लेकिन जरूरत जरूर है ,क्योंकि बिना राजनीति में सक्रिय रहे रियासत की आर्थिक विरासत का प्रबंधन करना नामुमकिन है .इस समय भी सिंधिया परिवार के लगभग सभी सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं .ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्र में मंत्री हैं तो उनकी बुआ यशोधरा राजे सिंधिया मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री हैं. बड़ी बुआ वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं.

ग्वालियर बिना राजा, महाराजा के नहीं रह सकता ऐसा मुझे 26 साल के महाआर्यमन सिंधिया के जन्मदिन पर रानीमहल में हुए जलसे को देखकर लगा .रानीमहल में महाआर्यमन का अभिनंदन करने उमड़ी भीड़ हालांकि पूरे ग्वालियर का प्रतिनिधित्व नहीं करती किन्तु इस भीड़ में वे तमाम लोग शामिल थे जो किसी दल के प्रति नहीं बल्कि महल के प्रति आस्थावान हैं .महाआर्यमन केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के इकलौते पुत्र हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो भाजपा में शामिल होने के बाद अपने आपको महाराज कहलवाना बंद कर दिया है लेकिन उनके बेटे युवराज के रूप में ही प्रतिष्ठित किये जा रहे…

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