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हाय महंगाई ! महंगाई !!.महंगाई !!!

@ राकेश अचल जिंदगी भंवर में है | महंगाई डायन अपने रौद्र रूप में जनता की जेब पर डाका डाल रही है और दुर्भाग्य ये की कोई तारणहार नहीं है | उस पर पोंगा-पंडित पुष्य नक्षत्र में खरीदारी करने की सलाह देकर जले पर नमक छिड़क रहे हैं | पिछले कुछ दिनों से ऐसा लगने लगा है जैसे कोई जेबकट पीछे पड़ा है ,जो बड़ी सफाई से जेब हल्की करता जा रहा है | लेकिन हकीकत ये है कि जेब किसी जेबकतरे की वजह से नहीं बल्कि मंहगाई की वजह से कमजोर यानि हल्की होती जा रही है | बढ़ती…

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@ राकेश अचल
जिंदगी भंवर में है | महंगाई डायन अपने रौद्र रूप में जनता की जेब पर डाका डाल रही है और दुर्भाग्य ये की कोई तारणहार नहीं है | उस पर पोंगा-पंडित पुष्य नक्षत्र में खरीदारी करने की सलाह देकर जले पर नमक छिड़क रहे हैं | पिछले कुछ दिनों से ऐसा लगने लगा है जैसे कोई जेबकट पीछे पड़ा है ,जो बड़ी सफाई से जेब हल्की करता जा रहा है | लेकिन हकीकत ये है कि जेब किसी जेबकतरे की वजह से नहीं बल्कि मंहगाई की वजह से कमजोर यानि हल्की होती जा रही है |
बढ़ती मंहगाई ने आम से लेकर ख़ास आदमी की ऐसी-तैसी कर दी है | ख़ास आदमी फिलहाल महंगाई के वार को सहने की स्थिति में है किन्तु आम आदमी का कचूमर निकला जा रहा है | विसंगति ये है कि प्रतिरोध की क्षमता खो चुका आम आदमी न आह भर सकता है और न कराह सकता है | बेलगाम सत्ता के पास मंहगाई की लगाम खींचने का जौहर नहीं है और विपक्ष के पास सत्ता के खिलाफ खड़े होने का हौसला |इस समय देश में महंगाई जैसे मुद्दा है ही नहीं |
सीमित आय पर गुजर-बसर करने वाले महंगाई के मारे हलकान हैं | महंगाई ने रसोई घर से लेकर हर चीज को अपना शिकार बना रखा है | चूल्हे को आग देने वाली रसोई गैस बढ़ते-बढ़ते हजार रूपये के आसपास पहुँच गयी है | ऊपर से शाक-भाजी,दाल,तेल के दाम चुपके से रोजाना बढ़ रहे हैं |अब या तो चूल्हा जला लीजिये या शाक-भाजी खरीद लीजिये. हालात ये हैं कि आप चटनी से भी रोटी नहीं खा सकते क्योंकि सामान्य शाक-भाजी ही नहीं टमाटर और प्याज के दाम तक आसमान छू रहे हैं | यानि अब झोला भर पैसे लेकर बाजार जाइये और मुठ्ठी भर सामान लेकर घर आइये |
पिछली तिमाही में ही पेट्रोल -डीजल के दाम प्रति माह 31 पैसे से बढ़ते-बढ़ते 4 रूपये लीटर तक बढ़ गए |अब या तो महंगा पेट्रोल-डीजल खरीदिए या अपना वाहन खड़ा कर दीजिये | आने-जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था या तो है नहीं और अगर है तो ओव्हरलोड है | यानि घर में ही कैद रहिये .दाल,आटा,तेल नमक ,साबुन सब कुछ चुपचाप महंगा हो रहा है |रोजमर्रा के सामानों के दामों पर लोगों की नजर उस तरह नहीं पड़ती जैसे कि पेट्रोल और डीजल के दामों पर पड़ती है |दुकानदार कहता है कि परिवहन लागत 18 से 20 फीसदी बढ़ गयी है |
महंगाई का असर केवल राजनीति पर नहीं पड़ा है | राजनीति मंहगाई से बेअसर है |राजनीतिक दल मंहगाई से जूझने के बजाय चुनावों ,उप चुनावों में जुटे हैं | कश्मीर कराह रहा है | वहां पहले कश्मीरी पंडित मारे जा रहे थे और अब गैर कश्मीरी मारे जा रहे हैं किन्तु सरकार असहाय है | अब ऐसी असहाय और उदासीन सरकार से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं ? महंगाई रोकना जनता के हाथ में नहीं है | ये काम सरकार का है | सरकारें ये काम न खुद कर रही हैं और न अडानी-अम्बानी से मंहगाई कम करने के लिए कह रही हैं |बाजार पर इन्ही दो घरानों का कब्जा है | टाटा-बाटा जैसे बाद में आते हैं |
पिछली जनवरी में जहां पांच सौ रूपये में साढ़े पांच लीटर पेट्रोल मिलता था,लेकिन अब एक लीटर कम मिलता है.यानि आम आदमी के बजट में पेट्रोल सबसे बड़ा बोझ है | पहले जो राशन दो हजार में आता था वो ही अब तीन हजार में आ रहा है | मंहगाई ने आम आदमी से उसका खान-पान ही नहीं आवागमन और मनोरंजन तक छीन लिया है |आम आदमी की जिंदगी में बीमारियां तो कोढ़ में खाज जैसी हैं |अब आप ‘गम दिए मुस्तकिल ,कितना नाजुक है दिल’ वाला गाना ही गए सकते हैं |
एक तरफ मंहगाई बढ़ रही है दूसरी तरफ सरकार के खर्चे.सरकार कर्ज के बोझ से दबी है और तेल निकाल रही है जनता का | जनता आम आदमी के इस्तेमाल की हर चीज पर मनमाना कर वसूल कर रही है | सरकार को अपनी पड़ी है ,आम आदमी से उसका क्या लेना ? आम आदमी तो चुनाव के वक्त मुफ्त बिजली-पानी जैसी लालीपाप लेकर चुप हो जाता है |आम आदमी की लड़ाई में न संसद उसके साथ है और न निर्वाचित जन प्रतिनिधि,क्योंकि उन सबको तो मोटा वेतन और भत्ते हासिल हो ही रहे हैं | जन सेवा के लिए भी पगार पाने वाले धन्य हैं | उन्हें शर्म नहीं आती |अरे भाई जनसेवा के बजाय कोई दूसरा कारोबार कर देखिये ! , नानी याद आ जाएगी |
मंहगाई डायन सुरसा की बड़ी बहन है | सुरसा तो छप्पन योजन का मुंह खोलने के बाद रुक भी गयी थी किन्तु मंहगाई का मुंह लगातार अपना मुंह खोले जा रही है | कोई हनुमान उसका मुकाबला करने को तैयार नहीं है | हनुमानों के पास अब कोई राम काज शेष बचा ही नहीं है | राम मंदिर का शिलान्यास हो चुका है | शिलायें पहले से रखी हुईं हैं ,ऐसे में कोई हनुमान क्यों महंगाई डायन के सामने परीक्षा देने के लिए तैयार हो ? मंहगाई न छप्पन इंच के सीने से डरती है और न किसी लौह पुरुष से उसे डर लगता है | कृषि प्रधान देश का किसान सरकार और भगवान दोनों की मर झेल रहा है | बीते सात साल में भारत कृषि प्रधान देश न होकर नेता प्रधान देश हो गया है |देश की अर्थव्यवस्था नेताओं पर आधारित है कृषि पर नहीं |
मंहगाई ने सोना-चांदी को छोड़ रखा है | महंगाई डायन जानती है कि आम आदमी सोना न खा सकता है और न ओढ़-बिछा सकता है | कारण साफ हैं |क्योंकि मंहगाई जानती है कि आम आदमी की हैसियत कार खरीदने की रह ही नहीं गयी | ये ख़ास आदमियों का वाहन है | मेरे पड़ौसी तो पिछले पंद्रह साल से नयी कार खरीदने की योजनाएं बना रहा हैं | लेकिन उस पर अमल नहीं कर पा रहे | पंद्रह साल पुरानी कार ही उनका साथ दे रही है.उसके पीछे भी माननीय गडकरी पड़े हैं,कहते हैं कि पुरानी कार सड़क पर चलने नहीं देंगे | जैसे सड़कें उनके पिता जी ने बनाई हैं |होना तो ये चाहिए था कि गडकरी जीवन में केवल एक कार खरीदने वालों को सम्मानित करते ,उन्हें प्रोत्साहन पैकेज देते | लेकिन हो उलटा रहा है | अब कोई आम आदमी महंगे पेट्रोल के चलते नई कार कैसे खरीद सकता है ? गडकरी ने तो टोल नाकों की संख्या बढ़कर सड़कों पर चलना भी मुहाल कर दिया है |
मंहगाई रोकने के लिए धर्मभीरु सरकार को जगह-जगह मंहगाई के मंदिर बनवा देना चाहिए. सरकार तो मंहगाई को थाम नहीं पा रही |मुमकिन है कि मंदिरों में प्राण-प्रतिष्ठा पाकर मंहगाई आम जनता पर थोड़ा-बहुत रहम कर दे |
[लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं ]

@ राकेश अचल जिंदगी भंवर में है | महंगाई डायन अपने रौद्र रूप में जनता की जेब पर डाका डाल रही है और दुर्भाग्य ये की कोई तारणहार नहीं है | उस पर पोंगा-पंडित पुष्य नक्षत्र में खरीदारी करने की सलाह देकर जले पर नमक छिड़क रहे हैं | पिछले कुछ दिनों से ऐसा लगने लगा है जैसे कोई जेबकट पीछे पड़ा है ,जो बड़ी सफाई से जेब हल्की करता जा रहा है | लेकिन हकीकत ये है कि जेब किसी जेबकतरे की वजह से नहीं बल्कि मंहगाई की वजह से कमजोर यानि हल्की होती जा रही है | बढ़ती…

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