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प्रियंका के बिना लड़े नहीं जीतेगी यूपी में कांग्रेस

(Dheeraj Bansal) उत्तरप्रदेश में उत्तरदायी सरकार बनाना कांग्रेस के लिए कांग्रेस को अभी कितनी मेहनत करना पड़ेगी ये तो कहना कठिन है लेकिन एक बात तय है की यदि कांग्रेस यूपी के जरिये सत्ता में आना चाहती है तो उसे किसी भी तरीके से 2022 के विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत इतनी बढ़ाना पड़ेगी की कांग्रेस किसी अन्य दल के साथ मिलकर सरकार बनाने की बात कर सके.ये तभी मुमकिन है जब कांग्रेस की महासचिव खुद विधानसभा का चुनाव लड़ें ,और फिलहाल ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है. आपको याद होगा की 1988 में नारायण दत्त तिवारी के बाद…

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(Dheeraj Bansal)
उत्तरप्रदेश में उत्तरदायी सरकार बनाना कांग्रेस के लिए कांग्रेस को अभी कितनी मेहनत करना पड़ेगी ये तो कहना कठिन है लेकिन एक बात तय है की यदि कांग्रेस यूपी के जरिये सत्ता में आना चाहती है तो उसे किसी भी तरीके से 2022 के विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत इतनी बढ़ाना पड़ेगी की कांग्रेस किसी अन्य दल के साथ मिलकर सरकार बनाने की बात कर सके.ये तभी मुमकिन है जब कांग्रेस की महासचिव खुद विधानसभा का चुनाव लड़ें ,और फिलहाल ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है.
आपको याद होगा की 1988 में नारायण दत्त तिवारी के बाद कांग्रेस का कोई नेता यूपी में सरकार नहीं बना पाया .वैसे भी अब कांग्रेस के पास नारायण दत्त तिवारी के कद का कोई नेता यूपी में है भी नहीं जो भाजपा,समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का मुकाबल कर सके .यूपी में कांग्रेस के नए नेता न पनपने देने के लिए कांग्रेस खुद ही जिम्मेदव है .कांग्रेस के पुराने नेता पीढ़ियों के अंतराल के फेर में एक बार पटरी से उतरे तो चढ़े ही नहीं और जो नए नेता बने भी वे अपना कद इतना बड़ा नहीं कर पाए की पूरा उत्तरप्रदेश उनके ऊपर भरोसा कर सके .
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी पार्टी के लिए एक दिवास्वप्न है .जिस उत्तरप्रदेश से कांग्रेस पूरे देश पर शासन करने की शक्ति अर्जित करती थी उसी उत्तरप्रद्श में कांग्रेस हासिये पर चली गयी है.कांग्रेस से ज्यादा ताकत तो बसपा और सपा की है .पिछले तीन दशक में कांग्रेस यानि गांधी परिवार ने यूपी की सत्ता हासिल करने के लिए प्रयास भी किये लेकिन दुर्भाग्य से एक भी फलीभूत नहीं हो सका .कांग्रेस को शुक्रगुजार होना चाहिए कि अभी भी उत्तर प्रदेश गांधी परिवार को संसद भेजने का अहसान करता आ रहा है .
पिछले दो वर्ष से यूपी जीतने कि लिए श्रीमती प्रियंका गांधी अटूट श्रम कार रहीं हैं,लेकिन उनका ये परिश्रम तभी फलीभूत हो सकता है जब प्रियंका खुद एक विकल्प कि तौर पर विधानसभा चुनाव लादेन और पार्टी को भी लगभग सभी सीटों पर अपने बूते चुनाव लड़वाएं .कांग्रेस की विवशता ये है की अब पूरे उत्तर प्रदेश में उसके पास संगठनात्मक ढांचा उतना मजबूत नहीं है की पार्टी अपने बूते सभी सीटों पर चुनाव लड़ सके. दीगर दलों से तालमेल कांग्रेस की जरूरत भी है और विवशता भी .कांग्रेस यदि समय रहंते चुनाव पूर्व इस तरह कि गठबंधन कर ले तो मुमकिन है की भाजपा को एक चुनौती दे सके .बिना गठबंधन कि कांग्रेस कि लिए यूपी में सरकार बनाना तो दूर विपक्ष का सम्मान हासिल करना भी सम्भव नजर नहीं आता .
कांग्रेस कि शीर्ष सूत्रों के मुताबिक , ‘प्रियंका गांधी कहीं से चुनाव नहीं लड़ने वालीं। गांधी परिवार का कोई भी सदस्य विधानसभा चुनाव में बतौर उम्मीदवार हिस्सा नहीं लेगा।’ यानी विधानसभा में गांधी परिवार के चुनाव न लड़ने की परंपरा बरकरार रहेगी. पिछले दिनों प्रियंका अपनी मां और अंतरिम पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी के लोकसभा क्षेत्र रायबरेली में थीं। दौरे के दौरान उनसे उनके ही कार्यकर्ताओं ने इस सीट से चुनाव लड़ने की मांग की। प्रियंका गांधी ने भी इस सवाल का सीधा जवाब देने की बजाय कहा, ‘अभी मैं आपसे कोई वादा नहीं कर सकती, लेकिन पार्टी में इसको लेकर चर्चा जरूर करूंगी। जैसा निर्देश होगा वैसे किया जाएगा।’
कांग्रेस को लगता है की गांधी परिवार कि सदस्य केवल केंद्र की राजनीति कि लिए हैं,वे राज्य की राजनीति कर ही नहीं सकते .ये अजीब किस्म की अहमन्यता है. पार्टी को आज यूपी में गांधी परिवार कि नेतृत्व की जरूरत सबसे ज्यादा है लेकिन प्रियंका भी हथियार डालती दिखाई दे रहीं हैं.गांधी परिवार पता नहीं क्यों हार से भयभीत रहता है जबकि गांधी परिवार कि अजेय होने कि इतिहास कि साथ पराजय कि पन्ने भी पहले से बाबस्ता हैं .गांधी परिवार कि मन से पराजय का भी जब तक नहीं निकलता तब तक यूपी को जीतना कांग्रेस कि लिए कठिन है.
उत्तर प्रदेश कि विभाजन कि बाद से राज्य में कांग्रेस कि पारम्परिक मतदाता वैसे ही कम हो चुके हैं और जो हैं भी इस हैसियत में नहीं हैं की राज्य में सत्ता तक पहुँचने में कांग्रेस की मदद कर सकें .कांग्रेस ने बीते 33 साल में उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार लगातार कम ही किया है किसी वजह से कांग्रेस केंद्र की सत्ता में नहीं है .केंद्र की सत्ता हासिल करने कि लिए आज कि प्र्धानमंत्री गुजरात छोड़कर यूपी में डेरा डाले हुए हैं किन्तु प्रियंका यूपी में रहकर भी राज्य विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं ?
प्रियंका को लगता है की अभी तक बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी से कोई प्रेरणा ले लेना चाहिए थी,लेकिन वे ऐसा नहीं कर पायी. ममता ने अकेले दम पर भाजपा को खदेड़ दिया .
राजनीति का मिथक है या हकीकत कि बिन प्रयास कि यहां कभी भी नया राजनीतिक इतिहास नहीं रचा गया. कांग्रेस को मुलायम सिंह ने उखाड़ा था तो मुलायम सिंह को कल्याण सिंह ने उखाड़ फेंका था.सत्ता पाने कि लिए संघर्ष करना पड़ता है. मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को उखाड़ने कि लिए अपना मोर्चा एकपल कि लिए बंद नहीं किया.मुलायम सिंह वापस लौटे तो उनके साथ रही बसपा ने मुलायम सिंह को चलता कर दिया .तब से लेकर 2017 तक यही सिलसिला चला.कांग्रेस कि लिए यूपी की सत्ता का दरवाजा अपने आप बंद हो गए .
कांग्रेस कि सामने अभी उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल करना प्राथमिकता नहीं है.सबसे पहले उन्हें विपक्ष की हैसियत हासिल करना होगी,इसके बाद ही सत्ता पर कब्जा होने की बात आएगी .मेरा स्पष्ट मानना है कि यूपी की सत्ता पर जो भी काबिज रहेगा वही दिल्ली की कुर्सी हासिल करेगा .फिलहाल यूपी में किसान आंदोलन कि चलते कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के लिए स्थितियां अनुकूल हैं ,यूपी में भाजपा को सत्ताच्युत करना इतना आसान नहीं है ,लेकिन किसान यदि अपने तेवर बदल लें तो यूपी का इतिहास बदला जा सकता है .और इतिहास तभी बदलते हैं जब यूपी जैसे बड़े प्रदेश में एक बार फिर बड़े दिल की राजनीति शुरू की जाये .
दुर्भाग्य दीखिये कि असल गांधी परिवार कि पास यूपी में कोई संभावना नहीं बची है ,जबकि भाजपा इसी गांधी परिवार कि दो-दो सांसद लिए बैठी है .यूपी कांग्रेस को पता है कि अब कांग्रेस की लाज नेताओं और कार्यकर्ताओं को मिलकर बचाना है .कांग्रेस को जितनी ऊर्जा उत्तर प्रदेश से हासिल हो सकती है उतनी ऊर्जा तो कांग्रेस कि तीन-तीन राज्य मिलकर भी उपलब्ध नहीं करा सकते .

(Dheeraj Bansal) उत्तरप्रदेश में उत्तरदायी सरकार बनाना कांग्रेस के लिए कांग्रेस को अभी कितनी मेहनत करना पड़ेगी ये तो कहना कठिन है लेकिन एक बात तय है की यदि कांग्रेस यूपी के जरिये सत्ता में आना चाहती है तो उसे किसी भी तरीके से 2022 के विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत इतनी बढ़ाना पड़ेगी की कांग्रेस किसी अन्य दल के साथ मिलकर सरकार बनाने की बात कर सके.ये तभी मुमकिन है जब कांग्रेस की महासचिव खुद विधानसभा का चुनाव लड़ें ,और फिलहाल ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है. आपको याद होगा की 1988 में नारायण दत्त तिवारी के बाद…

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