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अमरीका में भी लालू का अवतार

*********** हिन्दुस्तान में हमारे एक अग्रज व्यंग्यकार श्री हरि जोशी ने एक उपन्यास लिखा है ' अमरीकी लालू ' .उपन्यास जल्द आने वाला ही लेकिन इससे पहले इस उपन्यास के नायक और अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अफगानिस्तान के मामले में अपने देश को एक नया मशविरा देकर सबको चौंका दिया है. ट्रम्प की इसी विशेषता की वजह से शायद जोशी जी ने उन्हें अमरीकी लालू कहा होगा .ट्रम्प ने कहा है कि अमेरिका को तालिबान से अपने सभी उपकरण वापस मांगने चाहिए या वहां बम गिरा देने चाहिए। मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन पर भड़के ट्रंप ने कहा…

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हिन्दुस्तान में हमारे एक अग्रज व्यंग्यकार श्री हरि जोशी ने एक उपन्यास लिखा है ‘ अमरीकी लालू ‘ .उपन्यास जल्द आने वाला ही लेकिन इससे पहले इस उपन्यास के नायक और अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अफगानिस्तान के मामले में अपने देश को एक नया मशविरा देकर सबको चौंका दिया है. ट्रम्प की इसी विशेषता की वजह से शायद जोशी जी ने उन्हें अमरीकी लालू कहा होगा .ट्रम्प ने कहा है कि अमेरिका को तालिबान से अपने सभी उपकरण वापस मांगने चाहिए या वहां बम गिरा देने चाहिए। मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन पर भड़के ट्रंप ने कहा कि-‘ इतिहास में किसी भी सैन्य वापसी अभियान को इतनी बुरी तरह अंजाम नहीं दिया गया जिस तरह बाइडन प्रशासन ने अफगानिस्तान में किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका को तालिबान से अपने ‘सभी’ हथियार और 85 मिलियन डॉलर का एक-एक पैसा तुरंत वापस मांग लेना चाहिए।’
लालू दरसल एक ब्रांड है.भारत के पास इसका सर्वाधिकार था लेकिन अमरीका ने भी इसे हासिल कर लिया .भारत में लालू जी जिस अंदाज बयानी के लिए लोकप्रिय रहे हैं ठीक उसी तरह का कुछ-कुछ अंदाज अमरीकी लालू यानि डोनाल्ड ट्रम्प साहब का है .भारत में लालू केआगे जी लगता है लेकिन अमरीका में अमरीकी लालू के आगे साहब लगना पड़ता है .अमरीका साहबों का ही देश है .ट्रम्प ने गनीमत है कि अफगानिस्तान में फ़ौज भेजने वाले अमरीकी राष्ट्रपति को नहीं लपेटा,वरना वे मांग कर सकते थे कि अफगानिस्तान में अमरीकी फौजें भेजने के लिए जिम्मेदार तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश को तलब किया जाये और अफगानिस्तान पर हुआ सारा सैन्य खर्च उनके वारिसान से वसूल किया जाये .
अमरीका में एक अच्छी बात है कि किसी भी नाकामी के लिए पुराने लोगों को नहीं कोसा जाता .ट्रम्प ने अफगानिस्तान से फ़ौज वापस बुलाने के फैसले के लिए मौजूदा राष्ट्रपति को ही जिम्मेदार माना ,यदि यही मुद्दा भारत के सामने हटा तो इसके लिए नेहरू को जिम्मेदार माना जाता और खर्च वसूली के लिए राहुल गांधी का नाम लिया जाता .अमरीका में लोकतंत्र अलग तरह का है ,भारत से एकदम अलग .अमरीका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने पिछले 8 माह में एक बार भी अमरीका कि कथित नाकामियों के लिए देश के पहले राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन का नाम नहीं लिया .क्योंकि यहां ऐसे परम्परा नहीं है .यहां दिवंगतों के प्रति सियासत में आज भी थोड़ा-थोड़ा सम्मान है .
अमरीकी लालू यानि ट्रम्प साहब का बोलने का अंदाज और उनकी भाषा ठीक हमारे भारतीय लालू जी जैसी है .ट्रम्प के भाषणों से हास्य रस टपकता है.उन्हें देखकर चार्ली चैप्लिन तक विस्मृत हो जाते हैं .ऊपर वाले ने उन्हें हर तरीके से सम्पन्न बनाया है. वे अपनी अदाओं से हंसा भी सकते हैं और अपने बयानों से अमरीकियों को क्या दुनिया बाहर को रुला भी सकते हैं .ट्रम्प साहब का कहना है कि ‘इतिहास में कभी भी सेना की वापसी का अभियान इतनी बुरी तरह नहीं चलाया गया, जिस तरह से बाइडन प्रशासन ने अफगानिस्तान में चलाया।’
ट्रम्प साहब की बात जो बाइडन मानेंगे या नहीं ये तो ऊपरवाला जाने ,लेकिन सुनकर मजा गया कि यदि तालिबानी अमरीका को 85 अरब डालर न दें तो अमरीकी सेना को अफगानिस्तान पर बम बरसाना चाहिए .ट्रम्प साहब का बयान सुनकर तालिबानियों ने ऊपर वाले का बीसियों बार शुक्रिया अदा किया .तालिबानी सोचते होंगे कि अच्छा है कि जब अमरीका की सेना अफगानिस्तान से हटाई गयीं तब वहां के राष्ट्रपति ट्रम्प साहब नहीं है ,अन्यथा वे या तो रकम मांगते या फिर अफगानिस्तान पर बमवर्षा करा देते .
भारत में जैसे आजकल मोदी जी की बातों का समर्थन करने के लिए अमित शाह हैं ठीक वैसे ही ट्रम्प के समय में उनके माउथपीस तत्कालीन विदेश मंत्री माइक पोम्पियो हुआ करते थे. वे अब भी ट्रम्प साहब की बातों का समर्थ करते हैं. माउथपीस का काम ही होता है ईको पैदा करना .इसीलिए अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ, संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की पूर्व शीर्ष राजनयिक निक्की हेली सहित कई नेताओं ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बाइडन प्रशासन की आलोचना की है।अमरीका में आप आलोचना से ज्यादा कुछ कर नहीं सकते.किसी कि तस्वीर नहीं हटा सकते.
भारत के लालू जी यानि लालू प्रसाद यादव और अमरीका के लालू साहब यानि डोनाल्ड ट्रम्प की उम्र में कोई दो साल का अंतर् है. यानि आयु वर्ग समूह एक ही है ,इसलिए दोनों अपने-अपने देश के लिए अपने-अपने ढंग से लोगों का मनोरंजन करते हैं .भारत के लालू प्रधानमंत्री नहीं बन पाए लेकिन अमरीका के लालू अपने देश के राष्ट्रपति बन गए .वे तो दोबारा भी राष्ट्रपति बने रहते लेकिन जनादेश उनके खिलाफ चला गया .अमरीकी लालू की अच्छाशक्ति कबीले तारीफ़ है वे अभी भी कहते हैं कि 2024 में वापस वे ही आएंगे ,उन्हें आखिर अपने दोस्त भारत के पंत प्रधान से दोस्ती को और मजबूत जो करना है .
बहरहाल अमरीका के 232 साल के इतिहास में जो नहीं हुआ वो हमारे यहां के 75 साल के इतिहास में हो रहा है .अमरीका में पहले राष्ट्रपति के नाम का शहर देश की राजधानी है लेकिन हमारे यहां पहले प्रधानमंत्री के नाम की नहर भी शायद नहीं बची.यहां तक कि आजादी की हीरक जयंती के पोस्टर से भी उन्हें गायब कर दिया गया .मुझे लगता है कि इसके पीछे भी किसी लालू का ही दिमाग रहा होगा,अन्यथा कोई आखिर कैसे गांधी टोपी पहनने वाले नेहरू को छोड़ अंग्रेजों से माफी मांगने वाले सावरकर सर का फोटो खोज लाता ?
अब जो है सो है.हम सबको देखना है कि क्या अमरीका अपने लाऊ की मांग पर गंभीरता से विचार करता है या नहीं .क्योंकि हमारी और दुनिया की दिलचस्पी के केंद्र में इस समय अफगानिस्तान और अमरीका के अलावा अमरीका के लालू साहब ही हैं .
@ राकेश अचल

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