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बयान वापस हो गया लेकिन ‘ठेस’ नहीं

(राकेश अचल) केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी देश के किसान को जितने बेहतर ढंग से पहचानती हैं,उतना शायद किसान भी अपने आपको नहीं पहचानते होंगे.मीनाक्षी जी के मुताबिक़ दिल्ली में संसद घेरने वाले किसान नहीं बल्कि मवाली हैं. जब एक केंद्रीय मंत्री कुछ कहती हैं तो उसका कुछ न कुछ मतलब जरूर होता है .लेखी की परिभाषा के मुताबिक़ देश में दस करोड़ से ज्यादा किसान मवाली परिवार रहते हैं जो देश की आबादी का 48 फीसदी हिस्सा हैं .यानि हमारा देश कृषि प्रधान देश नहीं अपितु 'मवाली प्रधान' देश है . दरअसल मवाली का मतलब एक खल जाति से है…

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(राकेश अचल)
केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी देश के किसान को जितने बेहतर ढंग से पहचानती हैं,उतना शायद किसान भी अपने आपको नहीं पहचानते होंगे.मीनाक्षी जी के मुताबिक़ दिल्ली में संसद घेरने वाले किसान नहीं बल्कि मवाली हैं. जब एक केंद्रीय मंत्री कुछ कहती हैं तो उसका कुछ न कुछ मतलब जरूर होता है .लेखी की परिभाषा के मुताबिक़ देश में दस करोड़ से ज्यादा किसान मवाली परिवार रहते हैं जो देश की आबादी का 48 फीसदी हिस्सा हैं .यानि हमारा देश कृषि प्रधान देश नहीं अपितु ‘मवाली प्रधान’ देश है .
दरअसल मवाली का मतलब एक खल जाति से है ,जो प्राय:बदमाशी और गुंडागर्दी के लिए कुख्यात मानी जाती है. दक्षिण भारत की ये खल जाति कालांतर में एक मुहावरा बन गयी. इसकी बोली अलग,व्याकरण अलग,पहनावा अलग,चाल-चलन अलग होता है ,लेकिन मस्त होता है…बिंदास होता है ,जो जड़ों से कटे शहरी समाज को बिलकुल रास नहीं आता .संयोग से केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी जी भी उसी शहरी समाज से आतीं हैं जो अपनी जड़ों से कट चुका है .
भारत का किसान अमेरिका के किसान जैसा नहीं है. उसके पास न ढंग के कपडे होते हैं और न बेचारा नियम से अपनी हजामत बना पाता है ,सैलून या ब्यूटी पार्लर तो उसने देखे ही नहीं हैं. सर्दी,गर्मी और बरसात में खेतों ,खलिहानों में जिंदगी गुजारने वाले किसान की शक्ल-सूरत सचमुच मवालियों जैसी हो जाती है और इसके लिए हमारे नेता,सत्ता,कृषि वैज्ञानिक ,शिक्षा नीति सब जिम्मेदार है .मीनाक्षी लेखी जी बिलकुल नहीं .उन्होंने ने तो खेत-खलिहान देखे ही नहीं होंगे हालांकि उनके पूर्वज भी कभी न कभी तो किसान यानि मवाली ही रहे होंगे .
मीनाक्षी लेखी जी पढ़ी-लिखी महिला हैं ,उन्हें एक दशक में ही भजापा ने एक समान्य कार्यकर्ता से केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री तक बना दिया,ये सब उनके नसीब में पहले से लिखा था.किसी कि महरबानियाँ शायद इसके पीछे नहीं हैं.संयोग से लेखी जी दिल्ली में ही पढ़ीं सो गांव-किसान के बारे में ज्यादा जान,समझ नहीं पायीं और हड़बड़ी में या कहिये नासमझी में या कहिये उत्तेजना में किसानों को मवाली कह बैठीं .लगता है उनका साबका किसानों से कम मवालियों से ज्यादा पड़ा है. बहरहाल जैसा कि मैंने कहा वे समझदार हैं सो उन्होंने अपने शब्द वापस ले लिए लेकिन उनके शब्दों से देश के करोड़ों किसानों को जो ठेस लगी उसका कोई उपचार न भाजपा कर सकती है और न खुद मीनाक्षी लेखी जी .
मुमकिन है कि आपने लेखी जी का कहा न पढ़ा-सुना हो,तो मै उसे जस का तस दुहरा देता हूँ. लेखी ने कहा, ‘आप उन्हें किसान कहना बंद करें, वे किसान नहीं हैं. वे कुछ साजिशकर्ताओं के हाथों में खेल रहे हैं. किसानों के पास जंतर-मंतर पर बैठने का समय नहीं है. वे खेतों में काम कर रहे हैं. उनके (प्रदर्शनकारियों के) पीछे बिचौलिये हैं, जो नहीं चाहते कि किसानों को लाभ मिले.’ एक पत्रकार पर हमले और 26 जनवरी की हिंसा के सवाल पर लेखी ने कहा, ‘आप ने फिर उन्हें किसान कहा. वे मवाली हैं.’
भारत का एक जिम्मेदार मंत्री यदि किसान और मवाली में भेद नहीं जानता तो ये दुर्भाग्य है.भाजपा की विवशता है कि उसके पास ऐसे ही लोगों की संख्या ज्यादा है जो अल्प ग्यानी हैं या महाज्ञानी हैं .खैर ये भाजपा का अंदरूनी मामला है .असल बात तो ये है की देश के किसानों के दिल को लगी ठेस की परवाह भाजपा और उसकी सरकार करती है या नहीं ?सरकार के पास अब भी वक्त है कि वो किसानों की बात मानकर बनाये गए तीनों कानूनों को फौरन रद्द कर दे.इन कानूनों को अपनी प्रतिष्ठा से न जोड़े ,क्योंकि सरकार की प्रतिष्ठा साल दर साल लगातार कम हो रही है
देश के किसान एक लम्बे समय से आंदोलनरत हैं.सरकार लगातार उनके आंदोलन की न सिर्फ अनदेखी कर रही है बल्कि उसे
‘सेबोटेज’ भी कर रही है. सरकार को एक हद तक अपनी कोशिशों में कामयाबी भी मिली है लेकिन जिस किसान के कन्धों पर देश की अर्थव्यवस्था टिकी है उसे इस तरह निराश करना किसी भी तरह से ठीक नहीं है .हालांकि ये कठिन फैसला होगा लेकिन इतना कठिन भी नहीं जितना कि किसानों को मवाली कह देना .देश का मवाली किसान अगर सचमुच आहत हो गया और लेखी की गाली को दिल पर ले बैठा तो इसका खमियाजा सरकार को कभी भी,किसी भी मोड़ पर भुगतना पड़ सकता है .
किसान यानि मवाली अपने अपमान का बदला लेंगे या लेखी और उनकी पार्टी को माफ़ कार देंगे ,ये किसान खुद तय करेंगे .लेकिन ये तय सरकार को तय करना है कि वो किसानों को अन्नदाता समझती है मवाली ? ये हकीकत है कि इस समय देश की सरकार किसानों की सरकार नहीं है .किसानों की कोई सरकार बन भी नहीं पाती क्योंकि जब सरकार बनाने का मौक़ा आता है तब किसानों और उनके नेताओं को धकिया दिया जाता है .लेकिन ये सिलसिला अब ज्यादा देर चलने वाला नहीं है. मवाली से दिखने वाले किसान भी अपने हकों के प्रति जागरूक हो गए हैं ,और वक्त आने पर वे अपने लिए सही -गलत का फैसला कर सकते हैं .
आने वाले महीने किसान आंदोलन को किस दिशा में ले जायेंगे कहना कठिन है किन्तु किसानों का असंतोष कम से कम पंजाब और उत्तर प्रदेश में तो सत्तारूढ़ दल के लिए एक चुनौती की तरह काम करेगा. हरीयाणा में भी परिदृश्य बदला हुआ नजर आ सकता है ,क्योंकि किसानों के नेता ॐ प्रकाश चौटाला अब जेल के बाहर हैं .वे इस आंदोलन का नया चेहरा भी हो सकते हैं .

(राकेश अचल) केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी देश के किसान को जितने बेहतर ढंग से पहचानती हैं,उतना शायद किसान भी अपने आपको नहीं पहचानते होंगे.मीनाक्षी जी के मुताबिक़ दिल्ली में संसद घेरने वाले किसान नहीं बल्कि मवाली हैं. जब एक केंद्रीय मंत्री कुछ कहती हैं तो उसका कुछ न कुछ मतलब जरूर होता है .लेखी की परिभाषा के मुताबिक़ देश में दस करोड़ से ज्यादा किसान मवाली परिवार रहते हैं जो देश की आबादी का 48 फीसदी हिस्सा हैं .यानि हमारा देश कृषि प्रधान देश नहीं अपितु 'मवाली प्रधान' देश है . दरअसल मवाली का मतलब एक खल जाति से है…

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