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डिप्लोमेसी में बेकसूर आम को सजा

आम कूम आम होता है .उसका डिप्लोमेसी से क्या लेना-देना ? लेकिन पाकिसतानी हुक्मरान ये हकीकत समझते ही नहीं और खामखां ' आम डिप्लोमेसी' कर बैठे. इस डिप्लोमेसी में पाकिसातन की फजीहत हुई सो हुई बेचारे आम की भी फजीहत हो गयी,जबकि उसका कोई कुसूर था ही नहीं . आम को भारत में तो फलों का राजा कहा जाता है,माना भी जाता है .एक आम ही था जो कल तक आम आदमी की पहुँच में था लेकिन बुरा हो उन सियासतदानों का जिन्होंने इस' किंग आफ फ्रूट' को 'डिप्लोमेसी' का जरिया बनाने की नाकाम कोशिश की .आम का काम डिप्लोमेसी…

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आम कूम आम होता है .उसका डिप्लोमेसी से क्या लेना-देना ? लेकिन पाकिसतानी हुक्मरान ये हकीकत समझते ही नहीं और खामखां ‘ आम डिप्लोमेसी’ कर बैठे. इस डिप्लोमेसी में पाकिसातन की फजीहत हुई सो हुई बेचारे आम की भी फजीहत हो गयी,जबकि उसका कोई कुसूर था ही नहीं .
आम को भारत में तो फलों का राजा कहा जाता है,माना भी जाता है .एक आम ही था जो कल तक आम आदमी की पहुँच में था लेकिन बुरा हो उन सियासतदानों का जिन्होंने इस’ किंग आफ फ्रूट’ को ‘डिप्लोमेसी’ का जरिया बनाने की नाकाम कोशिश की .आम का काम डिप्लोमेसी करना कभी रहा ही नहीं. आम तो आम थे .उनका काम आम आदमी की सेहत का ख्याल रखने के साथ ही जुबान को खट्टा-मीठा करने का है .आम ये काम सदियों से बाखूबी करता आ रहा है .कभी किसी ने आम से कोई शिकवा नहीं किया ,शिकायत तो दूर की बात है.
मेरे पिता सरकारी मुलाजिम थे,मुझे पता है की उनके पास नजराने के तौर पर आम इफरात में आते थे .खुशबूदार आम,रंग-बिरंगे आम.कच्चे आम,पक्के आम,गदराये हुए आम और एकदम पिलपिले आम .आम भी हम हिन्दुस्तानियों की तरह अलग-अलग इलाकों के हिसाब से अपने नाम रखता है .किसी को कोई आम पसंद है तो किसी को कोई आम.हम हिन्दुस्तानी आम को अपने-अपने तरीके से खाते हैं .कोई चूसता है,कोई चाटखारे लेता है तो कोई खाता है.किसी को आम का चार पसंद है ,तो किसी को चटनी.किसी को शर्बत पसंद है तो किसी को जेम,,कोई पापड़ बनाकर खाता है तो कोई इसे जला-भुनाकर भी पीता है.
आम किसी भी शक्ल में मुंह और पेट के अंदर जाए नुकसानदेह नहीं होता .कुल मिलकर आम फायदेमंद ही होता है लेकिन हमारे पड़ौसी पाकिस्तान वाले इस आम का सही इस्तेमाल करने में चूक गए .
कहते हैं कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान आम का गलत इस्तेमाल करने से परेशानी में आ गए. इस्लामाबाद से खबर मिली कि कोरोना महामारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान ने नई कूटनीतिक रणनीति अपनाने की सोची, लेकिन वह उसमें भी कामयाब नहीं हो पाया. उसके खास दोस्त चीन और अमेरिका (China And America) ने ही उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. नई कूटनीति के तहत पाकिस्तान दुनियाभर के देशों को तोहफे में आम की अलग-अलग किस्मे भेज रहा है. हालांकि, खुद उसके परममित्र देश चीन और अमेरिका को पाकिस्तान की ये ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ पसंद नहीं आई और पाकिस्तान की ओर से तोहफे में भेजे गए आम वापस लौटा दिए.
पाकिस्तान विदेश मंत्रालय ने अमेरिका और चीन समेत 32 से अधिक देशों के प्रमुखों को तोहफे में आम भेजे थे, लेकिन अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अपने कोरोना वायरस क्वारंटाइन नियमों का हवाला देते हुए तोहफे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.इमरान साहब ने ये आम अपने मुल्क के राष्ट्रपति की और से भिजवाए थे .पाकिस्तान में राष्ट्रपति कि अभी थोड़ी-बहुत इज्जत है .पाकिस्तान के राष्ट्रपति डॉ. आरिफ अल्वी की ओर से 32 देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार के प्रमुखों को ‘चौसा’ आम भेजे गए थे. आमों की पेटी को ईरान, खाड़ी देशों, तुर्की, अमेरिका, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और रूस भेजा गया था. मीडिया रिपोर्ट ने सूत्रों के हवाले से बताया कि पाकिस्तान विदेश मंत्रालय की इस सूची में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का भी नाम था, लेकिन पेरिस से पाकिस्तान के इरादे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है.
कहते हैं कि ‘महाजन येन गत: स: पंथ: ,चीन और अमेरिका ने जब पाकिस्तानी आम लेने से इंकार कर दिया तो फिर भला दुसरे देश ऐसा कैसे कर सकते थे,सो चीन और अमेरिका की देखा-देखी कनाडा, नेपाल, मिस्र और श्रीलंका ने भी पाकिस्तान की ओर से तोहफे में भेजे गए आमों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. चीन ने हमारे यहां आम भेजे या नहीं इसका कोई पता नहीं है ,क्योंकि हमारे और पाकिस्तान के रिश्ते ख़ास किस्म के हैं .
पकिस्तान पहले नजराने में ही आम भेजता था,डिप्लोमेसी के लिए नहीं ,बल्कि दोस्ती के लिए .पहले पाकिस्तान द्वारा भेजे जाने वाले आमों की किस्मों में पहले ‘अनवर रत्तोल’ और ‘सिंधारी’ किस्में भी खेप का हिस्सा थीं, लेकिन इस बार दोनों को हटा दिया गया है.अब आम वापस भेजने की एक वजह ये भी हो सकती है कि चीन और अमेरिका की जुबान पर पहले वाले आमों की जिनसे चढ़ीं हों और उन्हें चौंसा का नाम ही पसंद न आया हो. मई तो आजकल अमेरिका में भारतीय आम ही खरीदकर खाता हूँ.यहां दुनिया के दुसरे तमाम मुल्कों के आम मिलते हैं ,लेकिन इनका डिप्लोमेसी से कोई लेना-देना नहीं हैं .
दुनिया में आम ही एक ऐसा फल है जो हर निजाम को पसंद रहा है. मुझे लगता है कि दुनिया में 1947 के पहले तक जितने भी विदेशी आक्रमणकारी भारत आये वे केवल आम के चक्कर में ही आये ,क्योंकि भारतीय आमों का कोई मुकाबला नहीं है. भारत के आमों की तरह ही भारत की दूसरी चीजें भी मुकाबले से बाहर मानी जाती हैं. फिलहाल भारत की विदेशनीति ,स्वास्थ्यनीति और कूटनीति भी भारतीय आमों की तरह हो गयी है .इन तीनों की कोई गारंटी नहीं है .आपको याद होगा कि भारत में लोग आम के तो छोड़िये गुठलियों तक के दाम वसूल कर लेते हैं .हमारे यहां आम खाना महत्वपूर्ण माना जाता है न कि आम के पेड़ों की गिनती करना .
एक अच्छी और सहृदय पड़ौसी होने के नाते हमारी पाकिस्तान के साथ बड़ी हमदर्दी है कि उसकी ‘मेंगो डिप्लोमेसी ‘नाकाम हो गयी.चीन और अमेरिका को दरियादिली दिखाना चाहिए थी .ये दोनों बड़े देश बड़े ही दरियादिल हैं.मिसाल के तौर पर चीन ने पूरी दुंनिया को दरियादिली से कोरोना-19 वितरित किया है वहीं अमेरिका ने कोरोना कि वैक्सीन .दरियादिल तो हम भी कम नहीं हैं. .हमने भी 78 देशों को मुफ्त में कोरोना वैक्सीन दे दी थी .हम पड़ौसी हो या अतिथि ,सबको देव् तुल्य ही मानते हैं.हमने अपने लोगों को वैक्सीन बाद में लगवाई ,पहले पड़ौसियों को दी ..भले ही हमारे देश में आज भी वैक्सीन की किल्ल्त है लेकिन हमारी ‘ वैक्सीन डिप्लोमेसी’ कामयाब रहे. हम भी यदि ‘ मेंगो डिप्लोमेसी ‘ करते तो मात खा सकते थे.हमें गर्व है कि हम कम से कम इस मामले में तो विश्वगुरू साबित हुए .
@ राकेश अचल

आम कूम आम होता है .उसका डिप्लोमेसी से क्या लेना-देना ? लेकिन पाकिसतानी हुक्मरान ये हकीकत समझते ही नहीं और खामखां ' आम डिप्लोमेसी' कर बैठे. इस डिप्लोमेसी में पाकिसातन की फजीहत हुई सो हुई बेचारे आम की भी फजीहत हो गयी,जबकि उसका कोई कुसूर था ही नहीं . आम को भारत में तो फलों का राजा कहा जाता है,माना भी जाता है .एक आम ही था जो कल तक आम आदमी की पहुँच में था लेकिन बुरा हो उन सियासतदानों का जिन्होंने इस' किंग आफ फ्रूट' को 'डिप्लोमेसी' का जरिया बनाने की नाकाम कोशिश की .आम का काम डिप्लोमेसी…

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