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एलोपैथी से लेकर मैथी-पैथी तक

मुझे आज 'यास ' तूफ़ान से होने वाली तबाही पर लिखना था लेकिन लिख रहा हूँ उस विवाद पर जो एक गैर-जिम्मेदार बाबा ने देश में शुरू किया है .दरअसल बाबा रामदेव मुझे पहली मुलाक़ात से ही छद्मराज नजर आये थे,ग्वालियर में में इनकी भिड़ंत भी इसी वजह से हुई थी.वे हमारे शहर के एक नामचीन्ह होटल के सबस्व महंगे कमरे में चटाई बिछाकर सोये थे .कमरा वातानुकूलित था .बाबा मुफ्त में योग सिखाने आये थे थे लेकिन शहर से लाखों रूपये बटोर कर ले गए थे.तब पतंजलि का जन्म हुआ ही था .बाबा ने चिकित्सा पद्यतियों को लेकर जैसा…

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मुझे आज ‘यास ‘ तूफ़ान से होने वाली तबाही पर लिखना था लेकिन लिख रहा हूँ उस विवाद पर जो एक गैर-जिम्मेदार बाबा ने देश में शुरू किया है .दरअसल बाबा रामदेव मुझे पहली मुलाक़ात से ही छद्मराज नजर आये थे,ग्वालियर में में इनकी भिड़ंत भी इसी वजह से हुई थी.वे हमारे शहर के एक नामचीन्ह होटल के सबस्व महंगे कमरे में चटाई बिछाकर सोये थे .कमरा वातानुकूलित था .बाबा मुफ्त में योग सिखाने आये थे थे लेकिन शहर से लाखों रूपये बटोर कर ले गए थे.तब पतंजलि का जन्म हुआ ही था .बाबा ने चिकित्सा पद्यतियों को लेकर जैसा ऊट-पटांग कहा उससे कहीं ज्यादा ऊटपटांग उनके की आचार्य बालकृष्ण ने कहा है .
बाबा रामदेव नसीब वाले हैं जो बिना कोई डिग्री,डिप्लोमा के भारत के आयुर्वेद और योग के महाचार्य बन बैठे हैं. कहने को उन्होंने दोनों विषयों की बुनियादी शिक्षा एक गुरुकुल में योग्य आचार्यों से ली है .वैसे लोकतंत्र में डिग्रियों की कोई हैसियत नहीं होती. हमारे देश के माननीय नेताओं की तमाम उपाधियाँ और शिक्षा -दीक्षा संदिग्ध है .ख़ास बात ये है की दो लाख लोगों को रोजगार देने वाली बाबा की कम्पनी 30 हजार करोड़ से ज्यादा की है .ऐसे में बाबा किसी को भी चुनौती दे सकते हैं. राजनीति में वे चुनौती बन नहीं पाए तो कोरोनाकाल में एलोपैथी को चुनौती दे बैठे ,ये बात अलग है कि उन्होंने चुनौती देकर माफी मांग ली .माफी मांगकर आदमी बड़ा बन जाता है. बाबा भी बड़ा बाबा है .
बाबा को जितना योग के बारे में ज्ञान है मुझे नहीं है. शायद मेरे जैसे तमाम पत्रकारों को न हो किन्तु बाबा स ज्यादा अनुभवी योगाचार्यों के सत्संग में मै भी रहा हूँ. बाबा जितना आयुर्वेद के बारे में जानते हैं उससे ज्यादा मेरी दादी को पता था .एक बीएएमएस डाक्टर के यहां सात साल कम्पाउंडरी करने के कारण मुझे भी आयुर्वेद और एलोपैथी की बुनियादी जानकारी है,इस बिना पर मै बाबा के एलोपैथी को लेकर दिए गए बयान की घोर निंदा करता हूँ .
मनुष्य के स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी चिकित्सा पद्यति का सम्मान करते हुए मुझे ये कहने में कोई शर्म नहीं है की आयुर्वेद भारत की एक विरासत है और कोई तीन हजार साल से भी अधिक पुरानी विरासत है ,लेकिन इसके सामने मै एलोपैथी को हीन,अनुपयोगी नहीं कह सकता .कोई पैथी अपनी उम्र से अधिक अपनी उपयोगिता के कारण महत्वपूर्ण होती है .आयुर्वेद,होम्योपैथी ,के अलावा तमाम वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियों को हम ठुकरा नहीं सकते,क्योंकि सबकी सब मनुष्य की निरनतर खोज और अनुभवों का परिणाम हैं .बाबा ने कहा था कि देश में कोरोना की दूसरी लहर में लाखों लोग एलोपैथी दवाएं खाने से मरे उनमें हजार डाक्टर भी शामिल हैं .
बाबा के ब्यान से आप सहमत हों तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मै बाबा के ब्यान को सौ फीसदी बचकाना मानता हूँ. बाबा को अभी मैथी के गुण-सूत्र का भी पूरा ज्ञान नहीं होगा और वे एलोपैथी को तमाम मौतों के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं .दअरसल बाबा चिकित्सा क्षेत्र में एक बाड़े व्यापारी हैं. कोरोना काल में अवसर का लाभ उठाने के लिए उनकी कम्पनी द्वारा बनाई गयी कोरोनिल किट को मान्यता न मिलने से वे बौखलाए हुए हैं .देश की जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं उन सभी में कोरोनिल को खपाये जाने की योजना मिटटी में मिल गयी इसलिए बाबा के सब्र का बाँध टूट गया .
बहरहाल बाबा के बयान को आईएमए ने गंभीरता से लिये और बयान के लिए रामदेव को कानूनी नोटिस भेजने के साथ ही स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर रामदेव पर महामारी एक्ट के तहत कार्रवाई करने की मांग की तो हड़कंप मच गया. केंद्र सरकार ने ब्यान को लेकर बाबा के खिलाफ कोई मामला तो दर्ज नहीं किया लेकिन उनसे माफी मंगवाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश जरूर की .लेकिन मामला रफादफा होता दिखाई नहीं दे रहा .बाबा के चेले बालकृष्ण ने एक नया ब्यान देकर आग में घी डालने का काम कर दिया है.
अब आप कुछ देर के लिए बाबा के एलोपैथी विरोधी बयान को भूल जाइये और उनके चेले के ट्वीट को पढ़िए. बालकृष्ण कहते हैं कि – ‘सारे देश को ईसाई धर्म मे तब्दील करने के षड्यंत्र के तहत बाबा रामदेव को टारगेट किया जा रहा है और योग तथा आयुर्वेद को बदनाम किया जा रहा है।बाबा के चेले बालकृष्ण का कहना है कि- ‘ बाबा रामदेव कोई उपहास नहीं उड़ा रहे थे बल्कि वह सिर्फ मॉडर्न मेडिसिन लेने के बावजूद डॉक्टर्स की मौत पर दुख जता रहे थे। आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि जितने भी वैज्ञानिक हैं, उनका पतंजलि में स्वगात है।
आपको मान लेना चाहिए कि बाबा रामदेव न तो आयुर्वेद के ठेकेदार हैं और न उन्हें किसी ने उन्हें इसका ठेका दिया है,न प्रवक्ता बनाया है. उनसे पहले कोई दो सौ साल से इस देश में दर्जनों छोटी-बड़ी कंपनियां आयुर्वेद के भरोसेमंद उत्पाद बिना किसी हो-हल्ला के बेच रहीं हैं .गुणवत्ता के मामले में बाबा की कम्पनी के उत्पाद कहीं नहीं लगते .बाबा ने आयुर्वेद को आम जनता की पहुँच से दूर करने का पाप जरूर किया है उन्हें मंहगा बनाकर .लेकिन ये अलग मामला है .
दरअसल कोरोनाकाल में देश की चिकित्सा व्यवस्थाओं को लेकर देश की सरकारों की जितनी फजीहत हुयी है उससे ध्यान हटाने के लिए बाबा ने मोर्चा सम्हला था लेकिन हड्डी गले में फंस गयी.मामला उलटे बांस बरेली का बन गया .अब बाबा और उनके शिष्य जो खुद एलोपैथी की मदद से अपना जीवन बचा चुके हैं तिलमिला रहे हैं. न सरकार उनकी मदद कर पा रही है और न पतंजलि के पास इस विवाद से आराम दिलाने का कोई आसव है,न मरहम .
दुनिया में किसी भी पैथी की किसी भी दूसरी पैथी से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है .मै यहां अमेरिका में बैठा देखता हूँ कि यहां लोग प्राकृतिक चिकित्सा ,योगा,होम्योपैथी,यूनानी सभी का सम्मान करते हैं ,लेकिन जब आपात स्थितियां बनतीं हैं तब एलोपैथी की ही शरण में जाते हैं क्योंकि किसी अन्य पैथी के पास आपात चिकित्सा की कोई व्यवस्था है नहीं. आपात स्थितियों में एलोपैथी ही जीवन की रक्षा करती है.दूसरी पैथियों में खासकर आयुर्वेद में भी शल्य चिकित्सा की व्यवस्था है लेकिन समय के साथ उसे विकसित नहीं किया गया .दूसरी चिकित्सा पद्यतियाँ मनुष्य के रहन-सहन और बदलते परिवेश के हिसाब से उतनी प्रभावी नहीं रह गयीं हैं ,लेकिन किसी का वजूद भी नहीं मिटा है .आयुर्वेद के प्रति आस्था ने ही बाबा रामदेव जैसे लोगों को अरबपति बना दिया है .क्या बाबा बता सकते हैं कि देश में कितनी महामारियों के समय आयुर्वेद के टीके काम आये.कितनों ने पोलियो का वध किया ?कितनों को टिटनेस से बचाया ?
भारत जैसे विशाल देश में जहाँ चिकित्सा की सुविधाएं आज भी आम आदमी की पहुँच में नहीं हैं वहां सभी चिकित्सा पद्यतियों का महत्व है,जरूरत है ,यदि सभी अपना काम मुस्तैदी से करें तो एलोपैथी पर आया भार कम हो सकता है ,पर दुर्भाग्य ये है कि इस दिशा में कोई काम नहीं करना चाहता .सब अपनी जेबें भरा चाहते हैं.चाहे फाइव स्टार कल्चर के एलोपैथी चिकित्सा के बड़े अस्पताल हों या पतंजलि जैसे संस्थान .सरकार को धर्म और राजनीति की जरूरतों के आधार पर किसी व्यक्ति,संस्था या पद्यति को संरक्षण नहीं देना चाहिए .अगर चिकित्सा जगत में बाबा जैसे अवसरवादी न आते तो मुमिकन है कि आज आयुर्वेद ने भी काफी प्रगति की होती तो आज एलोपैथी भी हथियार डालती न दिखाई देती .हमारे पास किसी भी पैथी की पर्याप्त दवाएं नहीं हैं.हम असमर्थ हैं .
मेरा विश्वास है कि हमारे शहर के आयुर्वेदाचार्य डॉ वेणीमाधव शास्त्री जितना जानते हैं उसका शतांश भी बाबा को पता नहीं होगा,लेकिन तुर्रा ये कि वे देश में आयुर्वेद,योग और हिन्दू संस्कृति के बसे बड़े पैरोकार,संरक्षक हैं .आपका जिस चिकित्सा पद्यति में यकीन है ,उसे अपनाइये लेकिन किसी के कहने से अपने जीवन को खतरे में मत डालिये .जीवन अनमोल है बाबा नहीं .बाबा को सरकार चाहे तो देश में पतंजलि पीठों के नाम पर जमीने हथियाने और सफल कारोबारी होने के एवज में ‘भारतरनत’ दे दे लेकिन उन्हें मजाक करने से रोके अन्यथा देश का,देश कि जनता का अहित ही होगा .
@ राकेश अचल

मुझे आज 'यास ' तूफ़ान से होने वाली तबाही पर लिखना था लेकिन लिख रहा हूँ उस विवाद पर जो एक गैर-जिम्मेदार बाबा ने देश में शुरू किया है .दरअसल बाबा रामदेव मुझे पहली मुलाक़ात से ही छद्मराज नजर आये थे,ग्वालियर में में इनकी भिड़ंत भी इसी वजह से हुई थी.वे हमारे शहर के एक नामचीन्ह होटल के सबस्व महंगे कमरे में चटाई बिछाकर सोये थे .कमरा वातानुकूलित था .बाबा मुफ्त में योग सिखाने आये थे थे लेकिन शहर से लाखों रूपये बटोर कर ले गए थे.तब पतंजलि का जन्म हुआ ही था .बाबा ने चिकित्सा पद्यतियों को लेकर जैसा…

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