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मरीजों के दर्द पर डाक्टरों की दवाई और जांच में भी चांदी ही चांदी….

प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले डाक्टरों की चांदी ही चांदी चल रही है। डाक्टर पेशेंट को देखने की मोटी फीस तो जहां वसूल ही रहा है। वही जांच और दवाईयों को भी अपने क्लीनिक से ही जरूरी कर दिया गया है। इससे अच्छा खासा कमीशन डाक्टरों की जेब में पहुंच रहा है। ऐसे में पहले से ही लुटापीटा मरीज अब ज्यादा दर्द से जूझ रहा है। कोरोना संकट में पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों पर अब निजी प्रेक्टिश करने वाले डाक्टरों ने भी उनके दर्द पर नमक छीड़कने का काम कर रखा है। डाक्टर पहले तो मरीज…

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प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले डाक्टरों की चांदी ही चांदी चल रही है। डाक्टर पेशेंट को देखने की मोटी फीस तो जहां वसूल ही रहा है। वही जांच और दवाईयों को भी अपने क्लीनिक से ही जरूरी कर दिया गया है। इससे अच्छा खासा कमीशन डाक्टरों की जेब में पहुंच रहा है। ऐसे में पहले से ही लुटापीटा मरीज अब ज्यादा दर्द से जूझ रहा है।
कोरोना संकट में पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों पर अब निजी प्रेक्टिश करने वाले डाक्टरों ने भी उनके दर्द पर नमक छीड़कने का काम कर रखा है। डाक्टर पहले तो मरीज से चेकअप की मोटी फीस वसूल रहे हैं। वहीं जांचों की जरूरत न होने पर भी जबरदस्ती जांचें कराई जा रही है। साथ ही दवाईयां भी ऐसी लिख रहे है कि जो सिर्फ उनके क्लीनिक पर बने मेडीकल स्टोर पर ही मिल रही है। बाहर के मेडीकल स्टोरों पर नहीं। साथ ही डाक्टर का यह भी फरमान रहता है कि जांच उनके क्लीनिक के द्वारा ही करवाई जाये और कहीं की जांच वह नहीं मान्य करेंगे। ऐसे में डाक्टरों कीे जेब में कमीशन की मोटी मलाई जा रही है।
पहले से ही आर्थिक संकट और बीमारी से परेशान मरीज डाक्टरों के इस अल्टीमेटम से बेहद तंग हो जाते है, क्योंकि क्लीनिक के जांच रेट बाहर के अपेक्षा काफी ज्यादा है। इससे सीधे-सीधे मरीजों की जेबों में डाक्टर डाका डालने का काम कर रहे है। यही हाल मेडीसिन को लेकर है। बाजार और क्लीनिक के मेडीकल स्टोरों के रेटों में बड़ा अंतर आता है। ये अंतर डाक्टर की जेब में कमीशन बनकर जाता है। इससे डाक्टरों की तानाशाही साफ दिखाई दे रही है। वही स्वास्थ्य विभाग यह सब आंखें मूंदकर देखता रहता है और मरीज व उसका अटेंडर मरता क्या नहीं करता है।

प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले डाक्टरों की चांदी ही चांदी चल रही है। डाक्टर पेशेंट को देखने की मोटी फीस तो जहां वसूल ही रहा है। वही जांच और दवाईयों को भी अपने क्लीनिक से ही जरूरी कर दिया गया है। इससे अच्छा खासा कमीशन डाक्टरों की जेब में पहुंच रहा है। ऐसे में पहले से ही लुटापीटा मरीज अब ज्यादा दर्द से जूझ रहा है। कोरोना संकट में पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों पर अब निजी प्रेक्टिश करने वाले डाक्टरों ने भी उनके दर्द पर नमक छीड़कने का काम कर रखा है। डाक्टर पहले तो मरीज…

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