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इसलिए पड़ा था नदी का नाम स्वर्णरेखा….

ग्वालियर शहर के मध्य में स्थित, वर्तमान में स्वर्णरेखा के नाम से जानी जाने वाली नदी, ग्वालियर के दक्षिण में बरई के पास से शुरू होकर नूराबाद के पास सांक नदी में मिल जाती थी। हनुमान बांध इस नदी पर सिंधिया स्टेट के समय में बना था। नदी हनुमान बांध से शुरू नहीं हुई है। इस नदी का प्राचीन वास्तविक नाम "वृश्चिकला" था। लगभग 14 वीं सदी में एक कवि ने सूर्य की रोशनी में चमकने के कारण नदी की तुलना स्वर्ण की रेखा से की थी। तब से इसका नाम ही स्वर्णरेखा पड़ गया था।

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ग्वालियर शहर के मध्य में स्थित, वर्तमान में स्वर्णरेखा के नाम से जानी जाने वाली नदी, ग्वालियर के दक्षिण में बरई के पास से शुरू होकर नूराबाद के पास सांक नदी में मिल जाती थी। हनुमान बांध इस नदी पर सिंधिया स्टेट के समय में बना था। नदी हनुमान बांध से शुरू नहीं हुई है। इस नदी का प्राचीन वास्तविक नाम “वृश्चिकला” था। लगभग 14 वीं सदी में एक कवि ने सूर्य की रोशनी में चमकने के कारण नदी की तुलना स्वर्ण की रेखा से की थी। तब से इसका नाम ही स्वर्णरेखा पड़ गया था।
ग्वालियर शहर के मध्य में स्थित, वर्तमान में स्वर्णरेखा के नाम से जानी जाने वाली नदी, ग्वालियर के दक्षिण में बरई के पास से शुरू होकर नूराबाद के पास सांक नदी में मिल जाती थी। हनुमान बांध इस नदी पर सिंधिया स्टेट के समय में बना था। नदी हनुमान बांध से शुरू नहीं हुई है। इस नदी का प्राचीन वास्तविक नाम "वृश्चिकला" था। लगभग 14 वीं सदी में एक कवि ने सूर्य की रोशनी में चमकने के कारण नदी की तुलना स्वर्ण की रेखा से की थी। तब से इसका नाम ही स्वर्णरेखा पड़ गया था।

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