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सिंधिया की प्रासंगिकता पर सवाल 

जय विलास पैलेस के सामने खड़े प्रशासन की ये तस्वीर आजकल सुर्ख़ियों में है।सुर्ख़ियों में ही नहीं है बल्कि इस तस्वीर के जरिये सवाल उठाये जा रहे हैं की प्रशासन आखिर महल की चाय पीने क्यों गया और उसने ढाई घंटे तक महल के सामने ग्वालियर के विकास की तस्वीर का खाका क्यों पेश किया ?हमारे ही मित्रों ने प्रशासन के सामने अपने घर पर चाय पीने के लिए भी बुलाया है। सवाल किये जा रहे हैं की महल में रहने वाले श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया आखिर क्या हैं जो प्रशासन उनके सामने नतमस्तक है?जबकि वे न सांसद हैं और न…

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जय विलास पैलेस के सामने खड़े प्रशासन की ये तस्वीर आजकल सुर्ख़ियों में है।सुर्ख़ियों में ही नहीं है बल्कि इस तस्वीर के जरिये सवाल उठाये जा रहे हैं की प्रशासन आखिर महल की चाय पीने क्यों गया और उसने ढाई घंटे तक महल के सामने ग्वालियर के विकास की तस्वीर का खाका क्यों पेश किया ?हमारे ही मित्रों ने प्रशासन के सामने अपने घर पर चाय पीने के लिए भी बुलाया है।
सवाल किये जा रहे हैं की महल में रहने वाले श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया आखिर क्या हैं जो प्रशासन उनके सामने नतमस्तक है?जबकि वे न सांसद हैं और न विधायक ?सवाल सरल भी है विरल भी ।लेकिन ज्योतिरादित्य के बहाने इन सवालों के उत्तर खोजे जाने चाहिए की क्या एक चुनाव जीतने -हारने से किसी व्यक्ति की हैसियत बदल जाती है ?ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने जीवन का पहला चुनाव हारे हैं और उनसे सवाल करने वाले हमारे जैसे आम आदमी ने एक भी चुनाव लड़ा ही नहीं ,लेकिन सवाल करने का हक हमारे पास है ।
सिंधिया के बुलावे पर महल जाने वाला प्रशासन अनाड़ी नहीं है। मुझे नहीं लगता की प्रशासन ने अपने मुखिया मुख्य सचिव को बताये  बिना ये कदम उठाया होगा ।प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी के वरिष्ठ नेता इसलिए उन्हें बैठक बुलाने का अधिकार निश्चित ही पार्टी और सरकार ने दिया होगा ।सिंधिया 18  साल सांसद  रहे हैं,केंद्र सरकार में मंत्री रहे हैं।उनके पास एक लंबा सियासी बिरसा भी है इसलिए उन्हें ग्वालियर के विकास पर चर्चा से नहीं रोका जा सकता ।चुनाव हारने से उनका अनुभव ,उनका ओहदा कम नहीं हो जाता ।पूर्व में भी ऐसा हुआ है ,ऐसे उदाहरण भी है जब आईएस अफसरों ने पूर्व की सरकारों के निर्देश पर अपने अफसरों के संघ के मुख्यालयों पर प्रजेंटेशन देने के लिए भेजा था।
बैठक कहाँ हो,कौन ले ?ये महत्वपूर्ण नहीं है ,महत्वपूर्ण ये है की इन बैठकों का क्या प्रतिफल निकला !सिंधिया चुनाव हारने के बावजूद इस स्थिति में हैं की राज्य और केंद्र सरकार से हस्तक्षेप कर ग्वालियर के लिए कुछ काम करा लें ।केंद्र में मंत्री ग्वालियर के ही श्री नरेंद्र सिंह तोमर को भी ये अधिकार है और सिंध्या को भी ।प्रशासन हमारे-आपके घर बैठक करने नहीं आएगा,आना भी नहीं चाहिए,आखिर हम क्या दखल देकर प्रशासन की मदद कर सकते हैं,सिवाय गाल बजाने के ?हमारे सांसद और विधायक इस तरह की बैठकें आयोजित कर भी लें लेकिन उनकी इतनी हैसियत नहीं है कि वे ग्वालियर के लिए कहीं से कुछ ले आएं ।
मै ग्वालियर की चिंता करने वाले अपने मित्रों के साथ हमेशा से हूँ और आगे भी रहूंगा लेकिन मुझे इस बात में कोई रूचि नहीं है कि प्रशासन ,,कहाँ और किसके साथ बैठकें कर रहा है ?सिंधिया ग्वालियर के लिए न अपरचित हैं और न अस्पृश्य ।वे हमेशा ग्वालियर के लिए फिक्रमंद रहे हैं,उनके पिता भी रहते थे और ,उनकी दादी भी ।ग्वालियर से उनका एक रिश्ता है ,इसे कोई नकार नहीं सकता ।वे कभी भी ग्वालियर के सांसद नहीं रहे लेकिन ग्वालियर उनसे दूर कभी नहीं रहा।वे किसी एक संसदीय क्षेत्र के नेता नहीं हैं।उन्हें सीमाओं में बाँधना भी हमारी कृपणता होगी।वे प्रदेश के ही नहीं देश के भी एक स्थापित नेता हैं। प्रदेश की सरकार में उनका भरपूर प्रभाव है ,इसलिए उनके बैठक बुलाने पर आपत्ति करना संकीर्णंता है ।आप इसे सामंती प्रवृत्ति कह सकते हैं,बेहतर होता कि सिंधिया प्रशासन के साथ जयविलास में बैठने के बजाय मोतीमहल या कलेक्ट्रोरेट में बैअतःकार ये विमर्श करते,लेकिन सब कुछ इतनी जल्द बदलना आसान नहीं होता ।
ग्वालियर के विकास के लिए सभी के सहयोग की आवश्यकता है।दुर्भाग्य से ग्वालेऔर विकास की मानसिकता खो चुका है ।एक जमानेमें ग्वालीर से लोकसभा और राज्य सभा के आधा दर्जन सांसद हुआ करते थे,पांच-पांच मंत्री प्रदेश की सरकार में थे लेकिन वे ग्वालोयर के लिए कुछ नहीं कर पाए ।और जो कुछ किया भी वो भी आधा-अधूरा किया ।जनता सब देखती है ,उल्ट-पलट भी करती है लेकिन उसके सपने पूरे नहीं होते ।अगर ऐसा न होता तो ग्वालियर में आज रूप वे भी होती,ग्वालियर में काउंटर मेग्नेट सिटी भी होती और ग्वालेऔर इंदौर के मुकाबिल प्रगति के मामले में सीना ताने खड़ा भी होता। ग्वालोयर का विकास प्राधिकरण हो या विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण तीन दशकों से सफेद हाथी बना बैठा है,किसी ने कुछ नहीं किया सिवाय सरकारी धन चुराने के ।गरीब पत्रकार भी इन संस्थाओं के छल से नहीं बचे तो आम जनता तो बच ही कैसे सकती है ?
बहरहाल सिंधिया की प्रासंगिकता उनके चुनाव जीतने या हारने से बाबस्ता नहीं है,न आगे होगी ।चुनाव हारने के बाद भी इंदिरा गांधी और अटल बिहारी बाजपेयी जो थे वो ही रहे और प्रधानमंत्री भी बने।सिंधिया भी जो हैं सोरहेंगे ये मानकर चलने में कोई हर्ज नहीं है।
@ राकेश अचल
जय विलास पैलेस के सामने खड़े प्रशासन की ये तस्वीर आजकल सुर्ख़ियों में है।सुर्ख़ियों में ही नहीं है बल्कि इस तस्वीर के जरिये सवाल उठाये जा रहे हैं की प्रशासन आखिर महल की चाय पीने क्यों गया और उसने ढाई घंटे तक महल के सामने ग्वालियर के विकास की तस्वीर का खाका क्यों पेश किया ?हमारे ही मित्रों ने प्रशासन के सामने अपने घर पर चाय पीने के लिए भी बुलाया है। सवाल किये जा रहे हैं की महल में रहने वाले श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया आखिर क्या हैं जो प्रशासन उनके सामने नतमस्तक है?जबकि वे न सांसद हैं और न…

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